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महंगाई और मंदी ने बढ़ाई सरकार की चिंता

इस सप्ताह आये अर्थव्यवस्था से जुड़े दो आंकड़ों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। पिछले सप्ताह आया महंगाई दर का आंकड़ा पांच फीसदी के मनोवैज्ञानिक को पार कर गया था और इस शुक्रवार को आए आंकड़ों के मुताबिक महंगाई में बढ़ोतरी का दौर अभी जारी है। लेकिन इससे अधिक चिंताजनक आंकड़ा रहा जनवरी, 2008 में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर का घटकर मात्र 5.3 फीसदी पर रह जाना है। जो पिछले साल जनवरी में 11.6 फीसदी पर रही थी। इस गिरावट के पीछे ऊंची ब्याज दरों को एक बड़ा कारण माना जा रहा है लेकिन महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों का ऊंचा बना रहना भी जरूरी बताया जा रहा है। ऐसे में सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि पूंजीगत सामान का उत्पादन मात्र 2.1 फीसदी की दर से बढ़ रहा है जबकि टिकाऊ उपभोक्ता सामान क्षेत्र में बढ़ोतरी की बजाय गिरावट आई है। सबसे अधिक चिंतित करने वाली बात पूंजीगत सामान क्षेत्र की कमजोर विकास दर है क्योंकि यह क्षेत्र औद्योगिक निवेश का संकेतक माना जाता है। वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि ऊंची ब्याज दरों को औद्योगिक उत्पादन की विकास दर में कमी आने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। महंगाई पर काबू पाने के लिए पिछले दो साल में जिस तरह से ब्याज दरों में बढ़ोतरी हुई है उसका असर औद्योगिक उत्पादन पर दिखने लगा है। लेकिन इस मंदी से उद्योग को उबारने के लिए सरकार ने बजट में कई कदम उठाये हैं। उत्पाद शुल्क दरों में की गई कमी से लेकर आयकर के मोर्चे पर दी गई भारी राहत मांग में बढ़ोतरी के लिए उठाये गये कदम हैं। यही नहीं एक अन्य अधिकारी का तो यहां तक कहना है कि बजट में किसानों के कर्ज माफ करने का जो फैसला लिया गया है वह भी मांग में बढ़ोतरी करने वाला साबित होगा। ऐसे में मंदी की जो आहट ताजा आंकड़ों में सुनाई दी है उसे काफी हद तक काबू करने में मदद मिलेगी। दूसरी ओर महंगाई का आंकड़ा लगातार दो सप्ताह पांच फीसदी से ऊपर रहा है। पहले 23 फरवरी को समाप्त सप्ताह के लिए आये आंकड़े में महंगाई की दर 5.02 फीसदी पर पहुंच गई थी। जबकि उसके अगले सप्ताह यह 5.11 फीसदी रही। ऐसे में अप्रैल में मौद्रिक नीति पेश करते समय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद पर पानी फिरता नजर आ रहा है। महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी के जरिये मांग पर अंकु श लगाने की रणनीति पर ही रिजर्व बैंक अमल कर रहा है। खाद्य उत्पादों और कच्चे तेल की कीमतों का जो रुझान आने वाले दिनों के लिए दिख रहा है वह ब्याज दरों के मोर्चे पर रिजर्व बैंक और सरकार के लिए बहुत कम गुंजाइश छोड़ने वाला है।

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