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रोज खुल रहे हैं चुनावी ऑफिस

हर जगह ऑफिस ही ऑफिस है। गली हो या चौक-चौराहा, ऐसा ही नजर आ रहा है। हर दिन एक नया ऑफिस खुल रहा है। ऐसे ऑफिसों में बनती हैं योजनाएं और एजेंडे। योजनाएं भी ऐसी कि इनके सामने बड़ी-बड़ी परियोजनाएं फेल हो जायंे। जी हां, चौंकिये नहीं। यह सरकारी ऑफिस नहीं है। चुनाव का मौसमी ऑफिस है। जैसा प्रत्याशी वैसा ऑफिस। जो प्रत्याशी आर्थिक रूप से मजबूत है, उनके कार्यालय में पूरा ताम-झाम है। कुर्सी, सोफा से लेकर पंखा तक ऑफिस की शोभा बढ़ा रहे हैं। वहीं आम प्रत्याशी के कार्यालय में सिर्फ दरी बिछी हुई नजर आती है। सुबह से लेकर देर रात तक इन कार्यालयों में होती है समीक्षा बैठक। हर दिन लिये जाते हैं नये-नये निर्णय। दिलचस्प यह है इन कार्यालयों में सबसे ज्यादा भागीदारी युवाआें की है। ताश के पत्ते बांटते और रणनीति बनाते कैसे रात हो जाती है, इन्हें पता ही नहीं चलता। कार्यकर्ता अपने प्रत्याशियों के चुनाव चिन्ह को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे आवंटित चुनाव चिन्ह के वास्तविक स्वरूप को मंगाकर देख और समझ रहे है। इससे हार्ड वेयर से लेकर कॉस्मेटिक आइटम वालों की चांदी हो गयी है। जिसे कैंची मिला है उसका कहना है -जब कैंची चलेगा तो केला कटेगा और जिसे घोड़ा मिला है उसका कहना है-जब घोड़ा चलेगा तो दिया बुतेगा। एक से एक जुमले सुनने को मिल रहै हैं।

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