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खाद्य निरीक्षकों के साथ गठजोड़ कर चलता हैं धंधा

मिलावटी व नकली खाद्य सामग्री के गोरखधंधे को बढ़ाने में खाद्य निरीक्षक का भी योगदान कम नहीं है। ये मिलावटखोरों का साथ देते हैं, उन्हें दूसरे के नाम का लाइसेंस बनवाकर देते हैं, छापे की जानकारी पहले ही दे देते हैं। यही नहीं मिलावटखोरों की मर्जी के मुताबिक ही नमूना भरते हैं। कई बार जिला प्रशासन के अधिकारियों के नमूना भरने पर खाद्य निरीक्षक जाँच रिपोर्ट तक में हेरफेर करवा देते हैं। और यही नहीं यदि जाँच मंे पकड़ भी लिए गए तो मुकदमा दर्ज कराने में विलम्ब करते हैं। लेकिन इन सभी काम के लिए उनका पैकेज तय है।ड्ढr अब बीते साल राजेंद्र नगर में जिलाधिकारी के नेतृत्व में छापा पड़ा, नकली खोया पकड़ा गया। तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इनमें एक विजय गुप्ता ने अनिल कुमार गुप्ता (चिंगू) के नाम का लाइसेंस दिखाया। जाँच में पता चला कि विजय गुप्ता ने अपने क्षेत्र के खाद्य निरीक्षक से मिलकर अनिल गुप्त के नाम से लाइसेंस बनवा लिया। इसी छापे में पुलिस ने अपने आरोप पत्र में संतोष गुप्त नाम के व्यापारी का उल्लेख किया कि यह विजय गुप्त के यहाँ बनने वाले मिलावटी खोये को बेचता है। पर, खाद्य निरीक्षकों की मिलीभगत से इसकी रिपोर्ट गायब हो गई।ड्ढr राजधानी के एक देसी घी के व्यवसायी बताते हैं कि दरअसल, इन खाद्य निरीक्षकों का एक पैकेज होता है। हर खाद्य निरीक्षक को एक माह में कम से कम पाँच नमूने भरने होते हैं। खाद्य निरीक्षक पहले ही दुकानदारों को बता देते हैं। दुकानदार की ‘सेवा’ के बदले खाद्य निरीक्षक दुकानदारों को इतनी छूट दे देते हैं कि जो चाहे नमूना भरवाएँ। दुकानदार नमूना ‘अमूल’ व ‘पराग’ जैसे ब्राण्डेड घी का दे देता है। एक नमूने के डेढ़ से दो हजार रुपए लेते हैं। त्योहार और अभियान के दौरान इनका रेट बढ़ जाता है। इस समय पाँच-पाँच हजार रुपए खाद्य निरीक्षक ले रहे हैं। चारबाग की एक डेयरी से राजधानी में सबसे ज्यादा मक्खन आपूर्ति होती है। कई प्रतिष्ठित ब्राण्डो के रैपर में इस डेयरी से मक्खन बनाकर बेचा जाता है। पर, दो खाद्य निरीक्षकों की मेहरबानी से सब चल रहा है। जिलाधिकारी चंद्रभानु भी स्वीकार करते हैं कि उनके पास इस तरह की शिकायतें आती हैं कि खाद्य निरीक्षक पैसे की उगाही करते हैं।

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