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पुण्यसलिला गंगा का हुआ मनुहार

पुण्यसलिला गंगा की शांत निश्चल बहती धारा। लहरों के बीच जगमग करतीं नौकाएं। पाश्र्व में रोशनी में नहाया गंगा सेतु। गंगा के कछार पर जल को पाश्र्व बनाकर कलाकारों के लिए बना मंच। उसपर मां गंगा की स्तुति में पेश ‘गंगा-एक संस्कृति’ नृत्य नाटिका की नयनाभिराम प्रस्तुति। गायघाट पर रविवार की शाम को दिखा यह अलौकिक नजारा। गंगा की जलधारा के साथ घुंघरुओं की रुनझुन संगीत की कर्णप्रिय मिसाल पेश कर रही थीं। रूठी गंगा को मनाने का एक और प्रयास। मां गंगा की इस स्तुति को देखने लोगों की महती भीड़ उमड़ी। परंपरागत तरीके से लोगों ने गंगा के तट पर बैठकर इस भव्य प्रस्तुति का रसास्वादन किया।ड्ढr ड्ढr हिन्दुस्तान व हिन्दुस्तान टाइम्स के संयुक्त तत्वावधान में रविवार की शाम ‘गंगा एक संस्कृति’ नृत्य नाटिका की अनुपम प्रस्तुति सांस्कृतिक संस्था ‘निनाद’ द्वारा की गयी। हिन्दुस्तान व हिन्दुस्तान टाइम्स के संयुक्त तत्वावधान में पिछले वर्षो में रूठी गंगा को मनाने के भगीरथी सदृश्य प्रयास शुरू किए गए हैं। गायघाट पर इस आयोजन केलिए 106 लंबे व 31 फीट चौड़े मंच को भव्य तरीके से सजाया गया था। लोग खासकर महिलाएं शाम से ही स्थल पर जुटने लगी थीं। मंच के आसपास लगभग बीस से पच्चीस नौकाओं पर शाम होते ही मशालें जलने लगीं। गंगा की लहरों पर दीपमालाएं रोशन हो गयीं। इस भव्य व अलौकिक परिवेश के बीच देश व सूबे की श्रेष्ठतम कथक नृत्यांगनाओं ने जैसे ही मां गंगे की स्तुति में नृत्य नाटिका पेश करनी शुरू की कि आसमान भव्य आतिशबाजी से जगमगा उठा। आतिशबाजी का नजारा देखने लोगों की आंखें लगातार आसमान पर टिकी रहीं। गंगा के तट से तेजी के साथ आसमान की ओर जाते पटाखे अलौकिक नजारे पेश कर रहे थे। आसमान भी फटते पटाखों से निकलती सतरंगी धाराओं के बीच इठलाता नजर आ रहा था।ड्ढr अर्धनारीश्वर को केंद्रित कर कोलकाता की नृत्यांगनाओं ने कथक शैली में भगवान शिव की आराधना की। लगभग दस मिनट की इस प्रस्तुति में सुस्मिता बनर्जी, नंदिनी चक्रवर्ती, अर्पिता व बोन्ही सेनगुप्ता ने भाग लिया। इसके बाद शुरू हुई गंगा की स्तुति।ड्ढr ड्ढr गंगा की भूमिका में चर्चित कथक नृत्यांगना नीलम चौधरी थीं। नृत्य नाटिका में मुजफ्फरपुर की पूजा,उपमा व राज्य की रश्मि चौधरी व भावना मिश्रा सहित 18 कलाकारों ने भाग लिया। लगभग चालीस मिनट की इस प्रस्तुति में इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की गयी कि कि क्या हम अपने अतीत के इस अमृत को विरासत के रूप में भविष्य की पीढ़ियों को सौंप पाएंगे? कैसे साठ हजार सगर पुत्रों के उद्धार के लिए महाराज भगीरथ की तप साधना से स्वर्ग से उतरीं गंगा। गंगा की उद्दाम धारा में पृथ्वी के बह जाने की आशंका से शिव ने उसे अपनी जटा में रोक लिया पर गंगा को तो पृथ्वी पर लाना था। फिर शुरू हुआ भगीरथ का तप। ‘नमामीशमीशाननिर्वाण रूपं विभुं व्यापक ब्रह्मवेद स्वरूपं।’ शंकर प्रसन्न हुए व गंगा धरती पर कलकल करती हुइर्ं उतरीं। कैसे सुर,संगीत,संस्कार व संस्कृति रचने वाली गंगा में शहरी जीवन की चकाचौंध ने आज जहर घोल दिया है। गंगा को प्रदूषणमुक्त रखने की दिशा में लोगों को जागरूक करने में इस नृत्य नाटिका के जरिए कलाकारों ने जो प्रयास किया आसानी से भुलाया नहीं जा सकेगा।ं

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