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यहाँ आज भी ‘हार’ रही कर्मनाशा

‘हमार बस्ती तो हाथी पर, बगल वाली पटेल बस्ती फूल का देहें और अहिर सारे तो साइकिल पर जइल..।’ करीब 12 लाख वोटरों वाले राबर्ट्सगंज संसदीय क्षेत्र का यह राजनीतिक विश्लेषण किया यहाँ के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित गाँव की एक रैदास महिला डंगरा देवी ने। चावल के दाने जैसे इस विश्लेषण से पूरी हाँडी का अंदाजा मिल जाता है। वाराणसी से करीब अस्सी किलोमीटर दूर विंध्य पर्वत श्रंखला पर स्थित इस गाँव में वर्ष 2004 में नक्सलियों ने वन महकमे की चेकपोस्ट को उड़ा दिया था।ड्ढr यह गाँव है ममगाई जो नौगढ़ कस्बे से करीब तीस किलोमीटर दूर है। कर्मनाशा नदी से कुछ दूरी पर स्थित इस गाँव में आज भी वैसा ही जातीय बोध है जैसा डॉ. शिव प्रसाद सिंह की कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ में था। फर्क सिर्फ इतना है कि कहानी का जातीय बोध ब्राह्मणों की सांस्कृतिक कट्टरता को दर्शाता है जिसकी बलिवेदी पर एक कँुआरी माँ भेंट चढ़ जाती है तो आज का जातीय बोध राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक है।ड्ढr अलग-अलग बिरादरी से जुड़ी यहाँ की औरतें सरकारी योजनाओं का फायदा लेने के लिए बेहद जागरूक हैं। वोट भले ही अलग-अलग पार्टियों को देती हों पर अपने हक के लिए सरकारी अफसरों से लड़ने में एक हो जाती हैं। ग्राम्या संस्थान नाम की संस्था से जुड़ी रामरती बताती हैं कि जननी सुरक्षा का पैसा देने में स्वास्थ्य विभाग का बाबू घूस माँग रहा था। हम सबने गिरेबान पकड॥कर अपना चेक ले लिया था। गाँव की ही तेतराबानों बच्ची के जन्म पर एक लाख रुपया मिलने से बड़ी खुश हैं। वह कहती हैं अब लड॥की के जनम पर कोई दुखी नहीं होता। रामरती कहती हैं ‘..हम औरतों ने तय किया है वोट भले ही किसी को भी दो पर एक दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ रहो। इस संवाददाता ने जब पूछा तो पता चला कि औरतों को सभी प्रत्याशियों से एक शिकायत है। ननको कहती हैं ‘ई चुनाव में आदमी को तो मुर्गा-दारू खूब मिल रहा है पर मेहराऊ को एक लैमनचूस तक नहीं।’ उन्हें याद है परधानी के चुनाव में उन्हें एक धोती मिली थी।

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