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नया निकाहनामा

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड ने महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने संबंधी जो नया निकाहनामा जारी किया है, उससे संकेत मिलता है कि मुस्लिम महिलाओं के कदम प्रगति की ओर बढ़ने लगे हैं। हर समय सिर पर लटकती तलाक की तलवार से महिलाओं को निजात दिलाने वाला यह निकाहनामा स्वागतयोग्य है। मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति वैसे ही कुछ कमजोर है, उस पर शौहर का जब जी चाहे तीन बार तलाक कहने का हक उन्हें और भी कमजोर बनाता है। महिलाएं प्राय: आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी नहीं होतीं, जिससे उन्हें और उनके बच्चों को तलाक का खामियाजा भुगतना पड़ता है। हालत यह है कि पुरुष ई-मेल और एसएमएस के जरिए भी तलाक लेने लगे हैं। नया निकाहनामा लागू होने पर नशे की झोंक में तीन बार तलाक कहनेभर से तलाक मान्य नहीं होगा और न ही ई-मेल, एसएमएस या फोन के जरिए तलाक होगा। इतना ही नहीं, विवाह का पंजीकरण भी अनिवार्य कर दिया गया है। इससे महिलाओं पर जुल्म कम होंगे और उनका जीवन बेहतर व सुरक्षित बनेगा। कुरान व हदीस की रोशनी में तैयार यह निकाहनामा शिया और सुन्नी दोनों पर समान रूप से लागू होगा। यह हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में जारी हुआ है ताकि आम आदमी भी इस बारे में जान सके और पति-पत्नी अपनी जिम्मेदारियां समझें। दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने इस सुधारवादी कदम का विरोध किया है। पहला निकाहनामा होते हुए नया निकाहनामा जारी करना उनकी नजर में गैर जरूरी है। लेकिन वे भूल जाते हैं कि 2005 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जो मॉडल निकाहनामा तैयार किया था, उसका मुस्लिम महिलाओं ने जमकर विरोध किया था। उसमें न तो महिलाओं के अधिकारों का जिक्र था और न ही तीन बार तलाक कह कर किसी महिला को यूं ही छोड़ देने के बारे में कुछ कहा गया था। नए निकाहनामे में महिलाओं को ऐसे अन्याय से छुटकारा दिलाने और तलाक लेने का हक दिया गया है। नया निकाहनामा महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है बशर्ते मुस्लिम समाज इसका पालन करे, न कि बेवजह विरोध।

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  • Web Title: नया निकाहनामा