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6 जुलाई, 2020|5:49|IST

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ढोल के खेल हैं बड़े निराले

पांच मार्च को प्रकाशित गफूर ‘स्नेही’ का नक्कारखाना ‘गरीबों का आर्केस्ट्रा है ढोल’ काफी रोचक लगा। ढोल का अपना ही महत्व है। पंच परमेश्वर की बैठकों का सूचक है ढोल, गांव-कस्बों में मुनादी का मंत्र है ढोल, अखाड़ों की रौनक है ढोल, सरकारी कर्ज डकारने वालों का ज्ञापन है ढोल, होली की टोली की पहचान है ढोल, नट-नटनियों से सर्कस करवाता है ढोल, रणक्षेत्र में तूती बजवाता है ढोल, बेगारों को रोजी-रोटी दिलवाता है ढोल, राग-रागनी में मेल करवाता है ढोल, वर-वधुआें को परिणय सूत्र में बंधवाता है ढोल, ‘आे! हट जा ताऊ पाछे ने’ बजवाता है ढोल। नक्कारखाने का नगाड़ा बजाता है ढोल।ड्ढr राजेन्द्र कुमार सिंह, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली किताब नहीं, पर परीक्षा हो गई सीबीएसई के अध्यक्ष ने बोर्ड की वार्षिक परीक्षा प्रारंभ होने से केवल 15 दिन पहले प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसमें बताया गया कि इस वर्ष बोर्ड की परीक्षा में 20 प्रतिशत प्रश्न हाई आर्डर थिंकिंग स्क्िल (हाट्स) होंगे। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि यह बदला हुआ पाठय़क्रम नवम्बर 2007 में ही विद्यालयों को भेज दिया गया था और प्री-बोर्ड की परीक्षाएं भी इस बदले हुए तरीके से हुई हैं। यदि यह सही है तो परीक्षा से ठीक पहले इस विज्ञप्ति की क्या जरूरत थी, क्योंकि इससे परीक्षार्थी सहम गए। वर्ष के अंत में पाठय़क्रम तथा प्रश्नपत्रों के तरीके को परिवर्तित करने का क्या तुक है? बारहवीं श्रेणी की हिन्दी की एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तक-रचनात्मक तथा व्यावहारिक लेखन जिसमें से कुछ प्रश्न (हाट्स तथा अन्य) आने हैं, आज तक बाजार में भी उपलब्ध नहीं है जबकि वर्षात हो गया और सत्र भी। ऐसे पाठय़क्रम का क्या लाभ, जब उसकी पुस्तक ही बच्चों को न मिल सके।ड्ढr जयदेव आहूजा, केशवपुरम, दिल्ली समाधान एक झटके में ‘परीक्षा का हौवा क्यों?’ (7मार्च) पढ़ा। कारण तो कई हो सकते हैं, किन्तु समाधान एक है कि परीक्षा परिणामों में अंकों तथा ग्रेड का खेल समाप्त कर दिया जाए। सिर्फ पास होने का प्रमाण पत्र दिया जाए। परीक्षा परिणाम में से फेल शब्द को निकाल दिया जाए। विषय में फेल विद्यार्थी को बैक देकर व पुन: परीक्षा ली जाए।ड्ढr कृष्ण कुमार वर्मा, प्रताप विहार, गाजियाबाद, उ.प्र. गांधी को महात्मा बनाया बिहार ने पिछले कुछ वषरे से कुछ लोग मानते रहे हैं कि जो बिहारी हैं, वह या तो मूर्ख हैं या दीनहीन। बिहारियों के बारे में यह बात कहने वाले अब अपनी सीमा लांघते हुए उस राज्य से चुने सांसदों, विधायकों और यहां तक कि वहां के मुख्यमंत्रियों के बारे में भी असंसदीय भाषा का प्रयोग करने लगे हैं। हिन्दुस्तान के 6 मार्च के अंक में छपे प्रथम पृष्ठ पर सबको है सियासी जमीन की चिंता, एकदम सटीक है। राज ठाकरे के बढ़ते कदम से (भले ही गलत ढंग से ही) बौखला कर बाल ठाकरे ने भी जिस तरह सामना के संपादकीय में विषवमन किया है, वह उनकी हताशा का ही परिचायक है। शायद बाल ठाकरे को मालूम नहीं है कि बिहार अकेला ऐसा राज्य है, जहां से हर साल औसतन 170 युवा प्रशासनिक क्षेत्र के लिए चुने जाते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम चंपारण जिले से ही आजादी की नींव डाली थी। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसा विद्वान व्यक्ितत्व का स्वामी भी बिहारी से ही था, जिन्हें भारतरत्न से भी नवाजा गया था।सबसे दिलचस्प तो जिस लालू यादव को बाल ठाकरे जोकर कहते थे उस जोकर ने वषरे से चल रहे घाटे वाली रेल को मुनाफे में लाकर आईआईएम हावर्ड विश्वविद्यालय तक को चकित कर दिया।ड्ढr निधि, सरस्वती गार्डन, नई दिल्ली हिन्दीभाषी होना कोई गुनाह है? असम में हिन्दीभाषियों पर जारी लगातार हमले प्रतिबंधित उल्फा उग्रवादी संगठन की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाते हैं। हाल ही में फिर उल्फा संगठन ने असम के डिब्रूगढ़ जिले के टेंगाखाट में रविवार की रात मार्च को चार हिन्दीभाषियों की निर्ममता पूर्वक गोली मारकर हत्या कर दी। मारे गए निर्दोष लोग उदलगिरी चाय बागान के पास ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले मजदूर थे। इस मुद्दे पर नेताआें के भाषण और आश्वासन से कोई हल निकलने वाला नहीं है। राज्य और केन्द्र सरकार को कठोर और कारगर कदम उठाने होंगे ताकि हिन्दीभाषियों पर हो रहे हमले को रोका जा सके।ड्ढr संतोष कुमार राय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीड्ढr ं

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