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अंत्योदय का दफ्तर

महात्मा गांधी ने कभी कहा था कि जो कुछ भी करो, यह सोच कर करो कि इस देश के सबसे गरीब व्यक्ित पर उसका क्या असर होता है। उसके बाद से इस देश में सबसे गरीब आदमी केन्द्र में आ गया। अक्सर वह केन्द्र से आेझल होने के लिए छुपता फिरा कि इन लोगों का ध्यान हटे तो मैं जरा रोजी-रोटी कमाऊं, लेकिन गांधी जी की सलाह पर डटे हुए लोगों ने उसे अकेला नहीं छोड़ा। आजकल देश की अर्थव्यवस्था बदल चुकी है, लेकिन विराट राष्ट्रीय अंत्योदय योजना में कोई फेरबदल नहीं हुआ है। सरकार तो अंत्योदय में लगी ही हुई है। बड़े-बड़े निजी उद्योग भी अपने-अपने यहां अंत्योदय योजना का भरपूर लाभ उठा रहे हैं या बिल्कुल आखिरी छोर पर मौजूद व्यक्ित को दे रहे हैं। सरकार ने भी यही पाया है कि यह योजना अपने दफ्तरों में लागू करना फायदेमंद है।ड्ढr किसी भी दफ्तर में यह योजना कैसे लागू होती है इसे देखा जाए। मान लीजिए कि दफ्तर को कोई योजना कार्यान्वित करनी है, तो दफ्तर का सबसे बड़ा अफसर अपने नीचे वाले अफसर को इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए कहता है। वह अफसर अपने मातहत तीन अफसरों के साथ इसे कार्यान्वित करने के लिए विचार-विमर्श करता है। तब यह पाया जाता है कि दरअसल एक चौथे अफसर के कार्यक्षेत्र में यह योजना आती है इसलिए उसे यह काम सौंप दिया जाए। चौथे अफसर को काम सौंपा जाता है, वह उसे अपने तीन अधीनस्थ अधिकारियों को काम सौंपता है। उनमें से एक तुरंत योजना के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापन बनाने छपवाने के लिए चल पड़ता है। दूसरा योजना से संबंधित बैठकों के लिए नमकीन, मिठाई का इंतजाम करने चला जाता है। तीसरा अपने अधीनस्थ कर्मचारी को योजना कार्यान्वित करने के लिए भेजता है। जब वह काम पर निकलता है तो पाता है कि उनके आने-जाने के खर्च के लिए कोई प्रावधान इस कार्यक्रम में नहीं है, इसलिए वह दो रुपए की मूंगफली योजना के खर्च से खरीदकर खाता है और घर चला जाता है। यह अंत्योदय का पहला चरण है, जिसमें दफ्तर के अंतिम कर्मचारी को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप कर उसे महत्वपूर्ण बनाया गया। दूसरा चरण तब शुरू होता है जब पता चलता है कि योजना कार्यान्वित नहीं हुई। फिर ऊपर से पूछताछ शुरू होती है और हर अफसर अपने निचले पायदान पर खड़े व्यक्ित की आेर इशारा करता है। अंत में पाया जाता है कि सबसे निचले कर्मचारी की गलती है। अगर वह बड़े साहब के घर सब्जी वगैरा लाता है, तो उसे माफ कर दिया जाता है वरना वह सस्पेंड हो जाता है। यह अंत्योदय का दूसरा चरण है, जिसमें आखरी पायदान पर खड़े व्यक्ित को इस व्यवस्था में फिर से महत्वपूर्ण पाया गया। सवाल यह है कि अगर सब कुछ उसी को करना है तो सीधे उसी से क्यों नहीं कहा जाता? गांधी जी नहीं रहे, इसलिए इस समस्या को हल करने वाला भी कोई नहीं बचा।

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  • Web Title: अंत्योदय का दफ्तर