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तसलीमा का दर्द

तसलीमा नसरीन के भारत छोड़ने पर कई लोगों को खुशी हुई होगी। इसमें सबसे आगे सत्तारूढ़ कांग्रेस और संप्रग के उनके साथी दलों के लोग हैं। तसलीमा का यहां होना बार-बार उनकी धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को कसौटी पर चढ़ाता था, और उन्हें रोज-रोज फेल होना पड़ता था। एक बार तसलीमा को देश निकाला देकर उन्होंने इस रोज-रोज की किचकिच से मुक्ित पाई। वाम दलों को यह इसलिए और भी सुखद लगा होगा क्योंकि जिस तरह तसलीमा से मुक्ित पाई गई वह पुराने कम्युनिस्ट देशों की याद दिलाता है जहाँ अक्सर विद्रोही लेखक को इस कदर अकेला कर दिया जाता था कि उसे देश छोड़कर भागने में ही भलाई नार आती थी। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी स्टॉलिन को मानने वाली पार्टी है और उसकी इच्छा तो असुविधाजनक लेखकों को साइबेरिया भेजने या मृत्युदंड देने की रही होगी, लेकिन भारत में उनका राज नहीं है इसलिए यह हल्की सजा ही सही। इस मामले में दक्षिणपंथी दलों का रिकार्ड भी उतना ही खराब है, उन्हें भी वे ही लेखक या कलाकार सुहाते हैं जो उनकी राजनीति की दृष्टि से लाभदायक होते हैं। चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन उन्हीं की वजह से देश नहीं आ पा रहे हैं। यह बात हमारे देश की लोकतांत्रिक परंपराआें पर प्रश्नचिह्न् की तरह बनी रहेगी कि एक असहमत लेखिका को हम अपने देश में शरण नहीं दे पाए। हमें तसलीमा का क्षमाप्रार्थी भी होना चाहिए कि उनके एक मनुष्य, एक स्त्री और एक लेखिका की तरह सम्मान और स्वाधीनता की हम रक्षा नहीं कर पाए, और हम साथ में उनसे यह प्रार्थना भी कर सकते हैं कि वे इस देश में बिताए अच्छे वक्त को याद करें। यह एक स्वाधीनचेता लेखक की अक्सर नियति होती है कि वह दमन और निर्वासन भुगते। जो बदहवासी और कड़ुवाहट उनके वक्तव्यों में दिख रही है वह स्वाभाविक है, लेकिन वे उससे ऊपर उठ सकें तो यह ज्यादा बड़प्पन होगा।

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