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तिब्बती अवाम के हक में भारतीय चीनी

तिब्बत में चीनी सशस्त्र सैनिकों की दमनकारी कार्रवाई उन चीनियों के गले के नीचे से नहीं उतर रही है, जो अब पूरी तरह से चीनी नहीं रहे हैं। भारत में बस गए चीनी मूल के ये लोग मानते हैं कि चीन को अब बदलना होगा। उन्हें जनतांत्रिक तरीके से अपने हकों के लिए लड़ने वालों को कुचलने की मानसिकता को छोड़ना चाहिए। पहाड़गंज में एक अरसे से प्रेक्िटस करने वाले डेटिंस डा. स्टीफन चेन दो बातें कहते हैं। पहली, चीन सरकार को तिब्बत को स्वायत्तता देने के संबंध में विचार करना चाहिए। स्वायत्तता का मतलब स्वतंत्र तिब्बत राष्ट्र से कतई नहीं है। दूसरी बात यह है कि दलाई लामा या फिर तिब्बत में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं को चीन से अलग अपने अस्तित्व के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। डा. चेन कहते हैं कि सारे मसले का कोई सौहार्दपूर्ण हल निकलना चाहिए। चीनी सरकार को अधिक लचीला रूख अपनाना चाहिए। भारत में बसे चीनियों को करीब 100 साल हो रहे हैं, पर उनमें एक खास चीनी गुण अब भी विद्यमान है। आमतौर पर चीनियों के लिए कहा जाता है कि ये प्राय: किसी विवादास्पद मसले पर बोलते नहीं हैं। जाहिर है कि तिब्बत के मसले पर भी यह कम ही बोल रहे हैं। कनॉट प्लेस के एक पुराने शूज शो-रूम के स्वामी एडवर्ड च्यू दिल्ली आईआईटी के विद्यार्थी रहे हैं। वह कहते हैं कि ओलंपिक साल में चीन में यह सब नहीं होना चाहिए। चीनी सरकार को स्थिति को अधिक परिपक्वता से काबू करने की कोशिश करनी चाहिए थी। उन्हें हमेशा ताकत के इस्तेमाल से बचना ही चाहिए। हालांकि उन्हें भी लगता है कि तिब्बतवासियों को चीन की मुख्यधारा से अपने को जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए।

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  • Web Title: तिब्बती अवाम के हक में भारतीय चीनी