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साल भर होता था होली की महफिल का इंतजार

यूँ तो होली की उमंग में हर दिल आज भी नाच-गाने को मचल उठता है पर लखनऊ में होली पर होने वाली संगीत की बैठकों का नजारा ही कुछ और हुआ करता था। एक वक्त था जब पुराने लखनऊ में होने वाली संगीत की इन महफिलों का लोग पूरे साल इंतजार करते थे। वक्त की रफ्तार के साथ ये महफिलें जुगलबंदी न कर सकीं और इतिहास का हिस्सा बन गईं। जिन्होंने संगीत का वह दरबार देखा है वे आज भी खुद को खुशकिस्मत मानते हैं।ड्ढr जानी-मानी कथक नृत्यांगना कुमकुमधर ने बताया कि वह अपने गुरु पं.लच्छू महाराज के साथ चौक स्थित संगीतविद् त्रिलोकी सेठ के यहाँ होली संगीतोत्सव में भाग लेने जाती थीं। उसमें कभी प्रेम तो कभी वियोग जैसे तमाम भाव होली के रंग में रंगे मिलते थे। शाम से शुरू होने वाली बैठक कभी-कभी तो दूसरे दिन तक चला करती थी। बैठकी में महिलाआें और पुरुषों के बैठने के लिए अलग-अलग व्यवस्था होती थी। खान-पान की भी व्यवस्था होती थी। इसमें प्रतिष्ठित रईस भी हिस्सा लेते थे। पखावज वादक पं.राज खुशीराम बताते हैं कि इस बैठक में शास्त्रीय संगीत को तरजीह दी जाती थी। इसमें पं.बिरजू महाराज, कुर्बान खाँ, कपिला राज आदि कलाकार कार्यक्रम पेश करते थे। वरिष्ठ तबला वादक पं.शीतल प्रसाद मिश्र बताते हैं कि ऐसी महफिलों में सितारा देवी का कथक, अहमद जान थिरकवा का तबला वादन, आफाक हुसैन खाँ साहब का तबला वादन आज भी उन्हें याद है। तानपुरा वादक कुंवर सुन्दर मेहरा याद करते हैं कि सुबह स्वांग भी होता था जिसके लिए बब्बन खाँ कश्मीरी और तवक्कल की मण्डली खास तौर पर आती थी। लालकुआँ में राधा बल्लभ के निवास और गणेश गंज में भारतेन्दु बाजपेई के घर भी ऐसी महफिलें सजती थीं।

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