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धूम्रदंडिका पर दंड

ेंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास के इरादे एकदम नेक हैं, पर विवाद हैं कि उनका पीछा नहीं छोड़ते। फिल्मों में सिगरेट पीने पर रोक के पीछे उनकी मूल भावना यही थी कि धूम्रपान को बढ़ावा न मिले और जनता को उसके कुप्रभावों से बचाया जा सके। फिर भी, होम करते हाथ जल गए। शाहरुख और अमिताभ जैसी नामचीन फिल्मी हस्तियों के साथ उनका खामख्वाह पंगा हो गया। इस होली की पूर्व संध्या में उन्होंने कई लोगों से एक साथ पंजा भिड़ा दिया। हालांकि कथित तौर से उनका मकसद जन-स्वास्थ्य की रक्षा है। उनका मंत्रालय तंबाकू निरोधक व नियंत्रण कानून में संशोधन के जरिए सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करने वाले व्यक्ित पर जुर्माना 100 से बढ़ाकर 200 रु. करने जा रहा है। इससे भी बड़ी गाज ऑफिसों पर गिरेगी, जहां धूम्रपान करने पर प्रति कर्मचारी 5000 रु. का जुर्माना ऑफिस को भरना पड़ेगा। होली के हुडदंगी तो यही कहेंगे- ‘‘वाह, खूब मजे हैं- अब दाब के सिगरेट पिएंगे हम और जुर्माना देगा ऑफिस।’’ ऑफिस मालिक यूनियन बनाकर विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। बुद्धदेव उनके साथ हैं। भाजपाई धर्मशास्त्र-कानूनों का हवाला देकर नारे लगाएंगे- ‘‘करे कोई, भरे कोई की नीति नहीं चलेगी, नहीं चलेगी।’’ इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि देशभर के ऑफिसों के प्रतिनिधि तथा राजनेता राज्यों की राजधानियों या दिल्ली में लॉन्ग मार्च करें। उस दिन वहां यातायात जाम होगा और उससे निपटने के लिए सरकार को कदम उठाने पड़ेगे। कर्मचारी अपने ऑफिस कम पहुंचे तो वहां सिगरेट पीने वालों की तादाद कम होगी और सरकार को जुर्माना कम मिलेगा। रामदास की ताजा घोषणा सरकार को भी सांसत में डाल सकती है। संप्रग सरकार वामदलों के बाहरी समर्थन की बैसाखी पर टिकी है, और उन्होंने परमाणु करार को लेकर उसे पहले ही अस्थिर कर रखा है। अब माकपा के पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री बुद्धदेव को सिगरेट छोड़कर आदर्श स्थापित करने की सीख का रामदास का कदम भी उलटा पड़ता नजर आता है। मुख्यमंत्री ने साफ कहा है कि वह सिगरेट नहीं छोड़ सकते। परमाणु करार पर खुंदक खाए बैठे वामदल सरकार अलबत्ता छोड़ सकते हैं- सोच लीजिए रामदासजी!

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