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चुनाव का बुखार

आलकआम चुनाव का बुखार अब दिखने लगा है। लोग कयास लगाने लगे हैं कि चुनाव वक्त से पहले होंगे या नहीं। हालांकि कोई भी उस बारे में पक्के तौर पर नहीं जानता। लालकृष्ण आडवाणी भी नहीं। हालांकि वह तो आदतन दावा कर रहे हैं कि चुनाव पहले ही होने जा रहे हैं। प्रणब मुखर्जी और राहुल गांधी भी नहीं जानते। वे खट से जल्दी चुनावों की बात को नकारते हैं। फिर किसी के पास कोई सुराग भी नहीं है। कोई नहीं जानता कि वाम पार्टियां क्या करेंगीं? इस मुद्दे पर वह सरकार को समर्थन बनाए रखेंगी या झटका दे देंगी। कांग्रेस दिक्कत में है कि लोगों के मूड को क्या समझा जाए? वह लगातार दुविधा में है। तमाम कयासों के बावजूद यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि अगर चुनाव होते हैं, तो असल मुद्दे क्या होंगे? मेरा मानना है कि दो मसलों पर चुनाव होगा। पहला, सेकुलर लाइन पर, दूसरा जमीन के बेहतर बंटवारे पर। आज सभी पार्टियां सेकुलरिज्म पर सिर्फ बातें करती हैं। मेरा खयाल है कि किसी एक धर्म या मजहब से जुड़ी पार्टियां सेकुलर नहीं हो सकतीं। मसलन, मुस्लिम लीग की तर्ज पर बनी संघ परिवार की तमाम पार्टियां या अकाली वगैरह। ऊपरी तौर पर भी वाम पार्टियां, कांग्रेस, मायावती की बीएसपी और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी वगैरह ही अपने को सेकुलर कह सकती हैं। मुझे लगता है कि अगला चुनाव अपने कॉसमोपॉलिटन समाज के भविष्य को तय करेगा। दूसरा जरूरी मुद्दा कायदे से जमीन के बंटवारे का है। हम भूमि सुधारों की बात करते रहे हैं। एक शख्स कितनी जमीन ले सकता है, उसे तय कर दिया है। लेकिन उसे लागू नहीं किया गया है। कुछ परिवार सैकड़ों एकड़ पर काबिज हैं। कुछ को एक गज जमीन नसीब नहीं है। वे कई सालों से उसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। अपनी बड़ी भारी जमीन तो नक्सलियों के कब्जे में है। नेपाल की सीमा से बिहार, उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश तक। नक्सलियों की कोई केंद्रीय कमान नहीं है, लेकिन उनके इलाकों में तो उन्हीं का सिक्का चलता है। राज्य सरकारों का नहीं। दरअसल, वह एक मुहिम है। सरकार के खिलाफ विद्रोह कम। लेकिन इंसाफ का तराजू उनकी आेर है। ‘खेत जोतने वाले का’, उनकी मांग जायज लगती है। सरकार को इस मसले पर कुछ करना चाहिए। चुनावी प्रक्रिया से उन्हें यह जमीन मिलनी चाहिए। सर सुलतान अहमद क्या आपको सर सुलतान अहमद की याद है? मुझे इसलिए याद है, क्योंकि एक बार मैंने उन्हें अपने पिता के यहां देखा था। उस वक्त वह मेरे चाचा उज्ज्वल सिंह से मिलने आए थे। 10 में हुई लंदन की राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में दोनों अपने-अपने समाज के नुमाइंदे थे। सर सुलतान अहमद बाद में वायसरॉय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में रहे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वह सबसे ज्यादा असरदार हिन्दुस्तानियों में से एक थे। उनके और मेरे परिवार को एक चीज और जोड़ती थी। दोनों के ही यहां अच्छे-खासे खान बहादुर, सरदार बहादुर और सर की तादाद थी। आजादी के आंदोलन से जुड़े हिन्दुस्तानियों के लिए वे टोडी बच्चा थे। यानी ब्रिटिश सरकार के टोडियों के बच्चे। ऐसा सोचना कुछ ज्यादती थी क्योंकि उनमें से कई तो बम फेंकने वाले क्रांतिकारियों से कम देशभक्त नहीं थे। फर्क यह था कि वे संवैधानिक तौर-तरीकों से हिन्दुस्तानियों को राज दिलाना चाहते थे। उनमें सर सुलतान अहमद भी थे। उनके बेटे तनवीरुल हसन ने हाल ही में एक किताब लिखी है ‘फ्रीडम एंड पार्टिशन।’ जाहिर है उसमें उनका जिक्र है। सर सुलतान अहमद बिहारी मुसलमान थे। 1880 में गया के पास अलीनगर पाली में क्रिसमस के दिन उनका जन्म हुआ था। वे शिया थे। मुहर्रम जोरशोर से मनाते थे। वे मक्का मदीना नहीं, बल्कि कर्बला और नजफ जाते थे। वह वकील थे। लंदन पढ़ कर आए थे। पटना में उनकी जोरदार प्रैक्िटस थी। उनके मुवक्िकलों में नवाब और राजे रजवाड़े थे। उन्होंने वहीं शानदार सुलतान पैलेस बनवाया था। उसमें यूरोपीय मेहमानों के लिए खास इंतजाम थे। वह पटना यूनिवर्सिटी के चांसलर हो गए थे। वह मुस्लिम लीग में भी गए थे। लेकिन उनके दो देशों की थ्योरी को नहीं माना। वह खुद को हिन्दुस्तानी मानते थे, इसलिए यहीं पर रहे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वायसरॉय काउंसिल नहीं रही। आजादी के बाद वह राजे रजवाड़ों का मामला ले कर दिल्ली आए थे। भोपाल के नवाब और हैदराबाद के निजाम को उन्होंने समझाने की कोशिश की थी। आखिरकार वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के पास पहुंचे। लेकिन नेहरू ने उनसे कहा, ‘मैं राजे-रजवाड़ों की फिक्र नहीं करता।’ सर सुलतान अहमद ने जवाब दिया था, ‘राजे रजवाड़े भी आपको कुछ नहीं समझते।’ उसके बाद सब खत्म हो गया था। बाद में अपने गांव में ही 82 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया छोड़ी।

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