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आधी निधि भी खर्च नहीं कर पाए माननीय

विधायकों की दिलचस्पी विकास के कामों में नहीं है। प्रदेश में ‘माननीयों’ की उदासीनता के कारण गाँवों में सड़क, पानी और विद्यालयों से जुड़ी सैकड़ों परियोजनाएँ अधूरी पड़ी हैं। वित्तीय वर्ष खत्म होने में चंद दिन बचे हैं और विधायकों ने अपने क्षेत्र में आधा काम भी नहीं कराया है। विधायक निधि के 825 करोड़ रुपए में से 55रोड़ रुपए सरकारी खजाने में यूँ ही पड़ा है। और तो और विधायकों ने सूखे की मार झेल रहे बुन्देलखण्ड की जनता पर भी तरस नहीं खाया। वहाँ केवल 41 फीसदी पैसा ही खर्च हुआ।ड्ढr 15वीं विधानसभा के चुनाव बीते साल मार्च-अप्रैल में हुए थे। सालभर पहले जनता से तमाम वादे कर ‘माननीय’ विधायक विधानसभा पहुँचे थे। सबने जनता से अपने विधानसभा हलके की तकदीर बदलने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद विधायक ‘महोदय’ सारे वादे भूल गए। खुद सरकार की वर्ष 2007-08 में संचालित परियोजनाआें की ताजा प्रगति रिपोर्ट इन विधायकों की पोल खोलती है।ड्ढr परियोजनाओं के तहत सड़क, खड़ंजा, पानी और विद्यालय भवन आदि बनवाने के लिए विधायक अपने विवेक से विधायक निधि से धन स्वीकृत करते हैं। यही नहीं सरकार विधायकों को कम्प्यूटर और लैपटॉप खरीदने तक की आजादी दे चुकी है। उसके बावजूद विधायक निधि को खर्च करने में माननीयों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।ड्ढr हैरत की बात तो यह है कि सूखे और भुखमरी की त्रासदी झेल रहे बुन्देलखण्ड के दोनों मण्डलों-चित्रकूट और झाँसी में भी विधायकों ने अपनी निधि से विकास के काम कराने में विशेष रुचि नहीं दिखाई। यहाँ विधायक निधि का पैसा 41 फीसदी ही खर्च किया गया। सूखे की मार से त्रस्त मिर्जापुर मण्डल में भी विधायक निधि से कराई जाने वाली परियोजनाआें का बुरा हाल है। स्वीकृत 2परियोजनाओं में से मात्र 13 परियोजनाएँ ही पूरी की जा सकी हैं। कानपुर देहात और मुरादाबाद में तो विकास और कल्याकारी परियोजनाओं पर अब तक कुल 11 व 13 फीसदी धन ही खर्च हो सका है। एक उच्चाधिकारी ने विधायकों की उदासीनता को चिन्ताजनक बताते हुए कहा कि सरकार ने विधायक निधि इसलिए बनाई कि विकास के कामों में विधायकों का सीधे हस्तक्षेप हो सके। पर विधायकों में बढ़ती अरुचि से विकास के साथ-साथ कल्याणकारी परियोजनाएँ भी प्रभावित हो रही हैं।

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