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छठा वेतन आयोग : खुशियों के बीच गम की परछाइयां

यायमूर्ति बी एन कृष्णा की अध्यक्षता वाले छठे वेतन आयोग द्वारा वित्त मंत्री पी चिदंबरम को अपनी रिपोर्ट सौंपे जाने के साथ ही सरकारी कर्मचारियों की बांछे खिल गईं। आयोग की अनुशंसाएं केंद्र सरकार के 45 लाख से अधिक कर्मचारियों के लिए किसीतोहफे से कम नहीं हैं। लेकिन इस खुशनुमा माहौल में केंद्र और राज्य सरकारों पर पड़ने वाले इसके गंभीर वित्तीय प्रभावों पर इस समय कम ही लोगों की निगाहें जा रही हैं। गौरतलब है कि 1में एक प्रशासनिक इकाई के तौर पर गठित वेतन आयोग लगभग हर 10 साल पर वेतन की इसका गठन किया जाता रहा है। जुलाई 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा छठे वेतन आयोग की स्थापना को स्वीकृति देने के बाद से ही वित्तीय जानकारों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों पर पड़ने वाले इसके खौफनाक असर पर कयासबाजी शुरू हो गई, क्योंकि पांचवे वित्त आयोग की सिफारिशों ने केंद्र और राज्य सरकारों के वित्तीय ढांचों को हिलाकर रख दिया था। पांचवे वेतन आयोग से पहले पेंशन की 50.रोड़ रुपये की बकाया राशि समेत केंद्र सरकार का वेज बिल 218.85 रुपये था जो 1000 में लगभगीसदी बढ़कर 435.68 रुपये करोड़ हो गया और राज्य सरकारों का वेज बिल 74 फीसदी बढ़कर 51548 करोड़ रुपये से 8रोड़ रुपये हो गया। अर्थशास्त्रियों के अनुसार राज्य के कुल राजस्व का लगभग 0 फीसदी राशि कर्मचारियों के वेतन देने में चली जाती है, ऐसे में राज्य सरकारों को विकास परियोजनाआें के लिए हमेशा वित्त की कमी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में छठे वित्त आयोग को लागू करना एक बार फिर विकास प्रक्रिया के लिए बाधक सि होगा। पांचवें वित्त आयोग का ऐसा खतरनाक प्रभाव हुआ था कि 2000 में 13 राज्यों के पास वेतन देने के लिए पैसे ही नहीं थे। केंद्र के इस कदम से नाखुश पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम ने पिछले साल केंद्र सरकार से बगैर उनसे मशविरा किए वेतन समीक्षा करने की घोषणा नहीं करने की हिदायत दी थी। इसके अलावा सरकारी स्तर पर कार्यकुशलता और प्रशासनिक सुधार करने जैसे नियम भी इसमें शामिल थे। ऐसे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पांचवें वेतन आयोग ने आर्थिक सुधार प्रक्रिया को बाधित किया था। इस पर अर्थशास्त्रियों की राय भले ही अलग-अलग हों, लेकिन दो साल पहले विश्व बैंक की टिप्पणी इस मामले में काबिलेगौर है। बैंक ने पांचवंे वित्त आयोग को भारत की खराब सार्वजनिक वित्तीय व्यवस्था का सबसे बड़ा कारण बताया था। बैंक ने कहा था कि सिविल सर्विस अनावश्यक रूप से बड़ा नहीं है लेकिन कौशल व कुशलता स्तर पर निश्चित रूप से असंतुलन है, क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सिविल सर्विस मेंीसदी कर्मचारी वर्ग 3 और वर्ग चार के हैं। कम ही लोगों को याद होगा कि वामपंथी दलों, ट्रेड यूनियनों द्वारा से वेतन आयोग गठित करने की लगातार मांग के बाद जब सरकार ने 2005 में सरकार ने इन मांगों के अध्ययन के लिए कैबिनेट सचिव बी के त्रिवेदी की अध्यक्षता में गठित समिति ने सरकार के आग्रह को खारिज करते हुए कहा था कि केंद्र सरकार अतिरिक्त बोझ वहन करने में समर्थ नहीं है और राज्य सरकारें 1में लागू हुए पांचवे वेतन आयोग के प्रभाव से अभी तक नहीं उबर पाई है। दसवें वेतन आयोग ने भी सरकार से इस तरह की पहल नहीं करने की सलाह दी थी। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2006 की शुरुआत में छठे वेतन आयोग गठित करने की घोषणा की थी जिसे कांग्रेस के आंतरिक सूत्रों ने भी सरकार के सहयोगी वामपंथी दलों के दबाव का परिणाम कहा था। आज जब आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार के समक्ष पेश कर दी है तो सरकार द्वारा दलील दी जा रही है कि इसका राज्य सरकारों पर इसका बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनके पास इस समय अतिरिक्त पैसे हैं। जबकि करीब-करीब हर राज्य सरकार आए दिन पैसे की कमी की समस्या की वजह से विकास परियोजनाएं बाधित होने की बात करती रहती है। वित्त मंत्री ने भी 2008-0े बजट में संकेत दिए थे कि छठे वित्त आयोग का वित्तीय प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.4 फीसदी होगा जो 1में पांचवे वेतन आयोग के लगभग बराबर है। इसलिए इससे पार पाना कठिन नहीं होगा। वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद 53037.70 अरब रुपये संभावित है। इस लिहाज से इसका प्रभाव 21,2.15 अरब रुपये होगा। साफ है कि इस समय भले ही इन सिफारिशों से लाखों लोगों के चेहरे पर मुस्कान है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले दिनों में इसके नकारात्मक असर को बेअसर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को नाकों तले चना चबाना पड़ेगा।

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