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भूटान में लोकतंत्र

भूटान की जनता ने संसद के निचले सदन-नेशनल असेम्बली के चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर राजतंत्र से संवैधानिक लोकतंत्र की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। खास बात यह है कि, देश में लोकतंत्र की पहल राजतंत्र के प्रतीक नरेश ने की, जिसकी मिसाल स्पेन के सम्राट हुआन कार्लोस को छोड़कर शायद कहीं नहीं मिलती। 10 के दशक तक सत्ता में रही फासीवादी फ्रांको सरकार के स्थान पर लोकतंत्र कायम करने में कार्लोस ने सक्रिय भूमिका निभाकर एक बड़ा आदर्श दुनिया के सामने रखा था। इसकी तुलना में भूटान में देर अवश्य हुई, पर मौजूदा व पूर्ववर्ती नरेश को श्रेय जाता है कि उन्होंने लोकतंत्र के लिए पहले जनता को तैयार किया, और फिर चरणबद्ध तरीके से उसका मार्ग प्रशस्त किया। 2001 में तत्कालीन नरेश जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने दैनिक कामकाज का दायित्व निर्वाचित मंत्रिपरिषद को सौंपा था और 2006 में अपने बेटे के पक्ष में गद्दी त्याग दी। तत्पश्चात पिता-पुत्र दोनों ने आम भूटानवासियों को समझाने का बीड़ा उठाया कि लोकतंत्र उनके लिए क्यों जरूरी है। भारत व श्रीलंका को छोड़कर अन्य दक्षिण एशियाई देशों में लोकतंत्र आज तक अपनी जड़ें नहीं जमा पाया है। पाकिस्तान व बांग्लादेश में सेनाध्यक्षों द्वारा निर्वाचित सरकारों की तख्तापलटें हुईं तो मालदीव में एकदलीय शासन है। नेपाल संवैधानिक लोकतंत्र के लिए अभी भी जूझ रहा है। ऐसे में भूटान नरेश की पहल पर गर्व किया जा सकता है और उससे दक्षिण एशिया के उन देशों को सबक लेना चाहिए, जहां लोकतंत्र की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं किए जाते। भूटान हिमालयी क्षेत्र का एक छोटा सा देश है और पिछले कुछ सालों में वहां काफी तरक्की हुई है। जनता को पेयजल, बिजली, शिक्षा व स्वास्थ्य रक्षा जैसी बुनियादी सेवाएं व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। लोकतंत्र के साथ जन-अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक है, इसलिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को नई शासन व्यवस्था के नियमों-कायदों के पालन का ख्याल रखना होगा और जनचेतना का निरंतर प्रसार भी जरूरी है। फिलहाल, वहां कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है, पर भूटान के पारम्परिक समाज को आधुनिकता की ओर ले जाते समय इस पहलू पर विशेष जोर देना जरूरी है।

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