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राजनीति को बदलती रोजगार गारंटी

ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के मामले में उत्तर प्रदेश का रिकार्ड निराशाजनक रहा है। टूटे-फूटे हैंड पंप, बेकार पड़े स्कूल और जीर्ण-शीर्ण स्थिति में स्वास्थ्य केंद्र तो आम बात हैं, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में भी भ्रष्टाचार है। इस वातावरण में, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (एनआरईजीए ) लागू करने जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के लिए क्या कोई उम्मीद है? मन में यह सवाल लिए हमने सोनभद्र जिले में दो दिन बिताए। केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद् के प्रतिनिधिमंडल के साथ रोजगार गारंटी योजना को लागू करने के बारे में अध्ययन किया। उत्तर प्रदेश के सबसे गरीब जिलों में से एक सोनभद्र में यह हमारा पहला दौरा नहीं था। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ तीन साल पहले काम के बदले अनाज योजना (एनएफएफडब्लूपी ) का सर्वेक्षण करने के लिए हमने इस जिले का दौरा किया था। उस समय इस कार्यक्रम की उपलब्धियां संतोषजनक नहीं थीं। काम का पैमाना बहुत छोटा था और भ्रष्टाचार अंतहीन। यह कार्यक्रम निजी ठेकेदारों के चंगुल में फंसा हुआ था और कर्मचारियों का बेरहमी से शोषण हो रहा था। उस समय उन्हें मुश्किल से 58 रुपए प्रतिदिन का न्यूनतम वेतन मिलता था और यह वेतन मिलने में बहुत देर भी होती थी। काम के लिए अक्सर मजदूरों के स्थान पर खुदाई व अन्य मशीनों का इस्तेमाल किया जाता था। सर्वेक्षण में एक स्थान ऐसा भी सामने आया, जहां मजदूरों को 1दिन के काम के मात्र 48 रुपए मिलते थे। इस वर्ष जनवरी, 2008 में जब हम सोनभद्र पहुंचे तो इन चीजों में काफी बदलाव महसूस किया। लगभग हर ग्राम पंचायत में काम का दायरा बढ़ा हुआ पाया। निजी ठेकेदारों की जगह कार्यक्रम लागू करने वाली प्रमुख एजेंसियों ने ले ली। एक साल में सौ दिन रोजगार और न्यूनतम वेतन जैसे अधिकारों के प्रति मजदूरों में जागरूकता आ गई है। साथ ही सार्वजनिक कामों में मजदूरों के शोषण में उल्लेखनीय कमी आई है। उदाहरण के लिए मजदूरों को वेतन मिलने में अब कभी-कभार ही देर होती है, मजदूरों के स्थान पर मशीनों का प्रयोग खत्म हो गया है और मजदूरी निर्धारित न्यूनतम वेतन के आसपास है। तीन साल पहले की तुलना में अब न्यूनतम वेतन लगभग दुगना यानी 100 रुपए प्रति दिन है।ड्ढr सोनभद्र में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का एक सकारात्मक पहलू यह है कि इससे महिलाओं के सशक्तीकरण की संभावना है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की कमाई के अवसर कम हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं जैसे अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाएं बिना वेतन घरेलू काम में लगी हैं। अपने घर के आसपास काम करके एक दिन में 100 रुपए कमाने की संभावना और अपनी कमाई अपने पास रखना आर्थिक स्वतंत्रता की तरफ एक उपयोगी कदम है। यह कार्यक्रम इन महिलाओं को अन्य महिलाओं के संपर्क में आने और अर्थव्यवस्था व समाज में सक्रिय भूमिका निभाने का मौका भी देता है। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, यह सोचना नादानी होगी कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से यह मिट चुका है। सोनभद्र में अपनी यात्रा के 24 घंटे के अंदर हमने फर्जी हाजिरी रजिस्टर (भीकमपुर ग्राम पंचायत) पाया। फिर भी पिछली बार की तुलना में इस बार उल्लेखनीय बदलाव देखा। उदाहरण के लिए रिकार्ड रखने के मामले में तरक्की हुई है। 2005 में साधारण सा रिकार्ड मिलना भी कठिन काम था और हाजिरी रजिस्टर को ‘गुप्त’ दस्तावेज की तरह रखा जाता था। आज इस तथ्य को मान लिया गया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के रिकार्ड सार्वजनिक संपति हैं और इनमें से कुछ रिकार्ड को इंटरनेट पर डाला जाना चाहिए। कार्यक्रम को लागू करने में पारदर्शिता के लिए यह महत्वपूर्ण कदम है। फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सोनभद्र में इस कार्यक्रम में सब अच्छा है। यहां इस कार्यक्रम को लागू करने में भ्रष्टाचार (जिसका स्तर शायद कम हो गया है) के अलावा अनेक कमियां हैं। उदाहरण के लिए उचित योजना का अभाव, तकनीकी स्टाफ की कमी और खराब निगरानी के कारण काम की क्वालिटी में सुधार की बहुत गुंजाइश है। गरडाह ग्राम पंचायत में पहाड़ की चोटी पर बहुत बड़े तलाब की खुदाई का काम हो रहा था। मजदूरों को पता था कि इसका कोई फायदा नहीं होगा। इसकी जगह दूरदराज के इस गांव के लिए सड़क बनाना ज्यादा उपयोगी होगा, यह जानते हुए भी वे रोजाना तालाब सिर्फ इसलिए खोद रहे थे ताकि उन्हें मजदूरी मिल जाए। इसी तरह, यह सुनिश्चित करने में अभी बहुत वक्त लगेगा कि काम के बदले अनाज योजना जैसे पहले के कार्यक्रमों की तुलना में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना एक अधिकार आधारित रोजगार कार्यक्रम है। इस बार न्यूनतम वेतन जैसी कुछ बातों के बारे में मजदूरों को थोड़ी-बहुत जानकारी है। लेकिन इस पूरे कानून के बारे में विस्तृत जानकारी उन्हें नहीं है। वे नहीं जानते कि कार्यस्थल पर सुविधाएं पाना, 15 दिन में वेतन का भुगतान होना या काम न होने पर बेरोजगारी भत्ता लेना उनका अधिकार है। यहां तक कि काम के लिए आवेदन प्रक्रिया भी उनके लिए रहस्यमय है। काम लोगों की जरूरत के हिसाब से न देकर ऊपर से थोपा जा रहा है। काम के सख्त नियम, स्टाफ की कमी, काम के मनमाने मापदंड, कार्यस्थलों का खराब प्रबंधन, शिकायतों का कमजोर निराकरण जैसे कई अन्य कारण भी चिंता का विषय हैं। सोनभद्र में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की खामियों को खोजी पत्रकार के लिए उजागर करना सहज होगा। राजनीतिक नेतृत्व का इस कार्यक्रम में रुचि लेना ही उत्तर प्रदेश के लिए आशा की किरण है। दो साल पहले जब यह कानून लागू हुआ तो प्रदेश सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया था। हाल ही में ग्रामीण मजदूरों में लगातार बढ़ती इस कानून की भारी लोकप्रियता के कारण अब जाकर सरकार जागी है। मजदूरी की दर बढ़ाकर 100 रुपए प्रतिदिन कर दी गई है और जिलाधीशों को इस कार्यक्रम को प्राथमिकता के आधार पर लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। राजनैतिक दलों में इस कार्यक्रम का बढ़-चढ़ कर श्रेय लेने की होड़ है। आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए यह होड़ बढ़ सकती है, जिसका लाभ अंतत: योजना को होगा। साथ ही ग्रामीण मजदूरों की सुध लेने की वजह से फायदा लोकतांत्रिक राजनीति को भी मिलेगा, क्योंकि इससे उत्तरदयित्व का बोध बढ़ेगा।ड्ढr लेखक जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टीटय़ूट, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबंद्ध हैं

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