अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जगजीवन राम : चारधाम में दलितों का प्रवेश

राष्ट्रपति बनने के पश्चात डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बद्रीनाथ धाम की यात्रा कर जब ऋषिकेश लौटे तब पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्हें इस बात की वेदना है कि आजादी के बाद भी अछूत कहे जाने वाले लोगों को भगवान बद्रीनाथ के दर्शन से वंचित रखा गया है। ‘इसकी मुझे तकलीफ है कि जिन लोगों को आजादी की लड़ाई में हम लोगों ने समान अधिकार दिलाने का वायदा किया था, उन्हें अभी भी मंदिरों में नहीं जाने दिया जाता। दिल्ली जाकर इस बार में मै वियोगी हरिाी से बात करूँगा।’ वियोगी हरि हरिान सेवक संघ के सचिव थे। लगभग 57 वर्ष पूर्व मई 1में एक दिन वियोगी जी ने मुझे बुलाकर कहा कि उन्हें इस बात का मानसिक तनाव है कि मंदिरों में हरिानों को भगवान के दर्शन नहीं करने दिये जाते। उन्होंने मुझे निर्देशित किया कि हरिान सेवक संघ के कार्यकत्त्राओं की टोलियां बनाकर मध्य हिमालय के तीर्थ स्थलों में उनका प्रवेश कराया जाय। एक माह बाद एक दर्जन हरिान सेवकों की टोली को लेकर मैं उत्तराखंड के मंदिरों में मंदिर प्रवेश के अभियान पर चला। कुछ स्थानीय हरिानों ने भी साथ दिया। एक सप्ताह के अन्तराल में गंगोत्री और यमुनोत्री के मंदिरों में पहली बार हरिानों ने प्रवेश किया। इसकी सूचना मैंने तार द्वारा वियोगी जी को दी। अखबारों में उसका समाचार छपा। गढ़वाल क्षेत्र के हरिानों के साथ हम केदारनाथ मंदिर में प्रवेश के लिये आगे बढ़े। लगभग बीस आदमियों की टोली भजन-कीर्तन करते जब केदारनाथ स्थित भगवान विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में पहुंची तो मुख्य द्वार पर लाठियों से लैस बड़ी संख्या में पुलिस कर्मियों को खड़ा देखा। श्रद्धालु एक-एक कर मंदिर में प्रवेश कर रहे थे। हम लोग भी पंक्ितबद्ध मंदिर में प्रवेश करने के लिये आगे बढ़े। पुलिस कर्मियों ने पूर्व चेतावनी दिये बिना लाठियां बरसानी शुरू कीं। सबसे आगे मैं था। सर पर चोट लगने से मैं लहू-लुहान होकर गिर पड़ा और बेहोशी की हालत में सरकारी अस्पताल चमोली में दाखिल किया गया। तीसर दिन कलकत्ता के एक दैनिक समाचारपत्र में इसकी खबर छपी, जिसे पढ़कर पण्डित वियोगी हरि स्तब्ध रह गये। जब मैं होश में आया तो पता चला कि विशिष्ट मरीा के रूप में मेरा उपचार हो रहा है। ऐसा क्यों? उस समय बाबू जगजीवन राम हरिान सेवक संघ में वरिष्ठ पदाधिकारी थे, और जवाहर लाल नेहरू मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री थे। समाचार पढ़कर उन्होंने पौड़ी के जिला मजिस्ट्रेट से टेलीफोन पर जानना चाहा कि केदारनाथ मंदिर प्रवेश के समय पुलिस लाठीचार्ज में गम्भीर रूप से घायल कार्यकत्त्राओं की क्या हालत है? अस्पताल के सिविल सर्जन से लेकर कम्पाउंडर तक सभी ‘विशिष्ट मरीा’ के उपचार और तिमारदारी में लगे थे। मंदिर में प्रवेश की यह घटना का महत्व दलितों की लड़ाई लड़ने वाले बाबू जगजीवन राम ही समझ सकते थे। आज, दिगभ्रमित चुनावी महासमर में लोकनायक जगजीवन राम की जन्म शताब्दी पड़ रही है। पांच अप्रैल 108 को बिहार के एक छोटे से गांव चंदवा (ािला आरा) के अछूत परिवार में जन्मे जगजीवन राम को बचपन से ही इस बात का अहसास होने लगा था कि समाज का वह वर्ग जिसमें उसका परिवार भी एक है, अस्पृश्यता का शिकार है, और मौलिक मानवाधिकारों से वंचित। गांव के प्राइमरी स्कूल में शिक्षा पूरी कर वर्ष 1में चंदवा की ऊबड़-खाबड़ सड़क पार कर आरा कस्बे की सड़क पर समान गति से आगे बढ़ते हुए भी रूढ़िवादी व्यवस्था ने बालक जगजीवन को कदम-कदम पर अहसास कराती थी कि तुम अछूत हो, अस्पृश्य हो-पोंगापंथी सामाजिक आचार संहिता के चलते नीची जात का विद्यार्थी कक्षा में सवर्ण छात्रों के साथ बराबरी का दर्जा नहीं पा सकता है। फिर भी 1में 11 वर्ष की अल्पायु में कुशाग्र बुद्धि के जगजीवन ने स्कूल से उत्कृष्ट श्रेणी में अपर प्राइमरी कक्षा उत्तीर्ण की। जगजीवन ने 1में कलकत्ता स्थित विद्यासागर कॉलेज से बीएससी पास किया। वहां उसी अवधि में वह भीमराव अम्बेडकर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मनमथनाथ गुप्त, और एम.एन.राय आदि राष्ट्रीय नेताओं के सम्पर्क में आए। विदेशी हकूमत के खिलाफ 1े ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में जगजीवन राम ने अग्रणी भाग लिया और गिरफ्तारी दी तथा चौदह माह जेल की सजा भुगती। बाबू जगजीवन राम नेहरू जी के अन्तरिम मंत्रिमंडल में 1में शामिल हुए, और सोलह वर्ष तक अनवरत रूप से केन्द्रीय मंत्रिमंडल में श्रम मंत्रालय से लेकर कृ षि, रल, संचार एवं परिवहन, रक्षा मंत्रालयों को कुशलता पूर्वक संभाला।ड्ढr ड्ढr लेखक पूर्व सांसद हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: जगजीवन राम : चारधाम में दलितों का प्रवेश