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तिब्बत की आग के तमाशबीन क्यों हैं हम

वषरे से ठंडा पड़ा तिब्बत का हिमालयी पठार एक बार फिर गरमाने लगा है। जो लपटें ल्हासा में भड़क उठी हैं, सरहद पार पहुंच हमें झुलसाने का जोखिम खड़ा करती नजर आ रही है। भारत-चीन संबंधों के उतार-चढ़ाव में हमेशा से तिब्बत की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। शुरू में ही यह बात समझ लेने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन भले ही कितनी ही बड़ी हस्ती क्यों न हो, उसे भारत का भाग्यविधाता नहीं समझा जा सकता और न ही उसकी खुशी या नाराजगी हमारे राजनय की एक मात्र कसौटी मानी जा सकती है। तिब्बत में असंतुष्ट युवावर्ग द्वारा हिंसक उपद्रव के बाद चीन ने भारत में वषर्ों से शरणार्थी के रूप में रह रहे दलाई लामा को अभद्र गाली-गलौज आरंभ कर दी है और बीच-बीच में भारत सरकार की पीठ यह कहकर थपथपाना आरंभ कर दिया है कि भारत सरकार की प्रतिक्रिया से चीन संतुष्ट है। घोर दुर्भाग्य है कि हमारी सरकार और नेतागण इस शाबासी से संतुष्ट और गद्गद् हो रहे हैं यह सोचकर कि नाजुक चुनौती का कितना बेहतरीन ढंग से उन्होंने सामना कर डाला है। भारत और चीन के खटाई में पड़े संबंधों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया 1में आरंभ हुई थी। तीन दशक बीत चुके हैं, पर जब चीन का जी चाहता है वह भारत की बांह मरोड़ देता है। कभी यह काम अरुणाचल में बड़े पैमाने पर नाजायज घुसपैठ के बहाने होता है, तो कभी सिक्िकम में नाथुला र्दे पर सरहदी व्यापार को पूर्ववत् बनाने के हठ के जरिए। 1ी सैनिक मुठभेड़ के बाद ध्वस्त इस पारंपरिक व्यापार का कोई लाभ आज भारत को उतना नहीं हो सकता जितना चीन को। चीन के सैनिक और वर्दीधारी सीमा शुल्क अधिकारी भारत की भूमि पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने भर से अपना मकसद साध लेते हैं। विवादास्पद- हजारों वर्ग मील फैले इस भू-भाग पर उनकी दावेदारी जगजाहिर होने लगती है। प्रतिदान के रूप में कोई भी रियायत देते वक्त चीनी ना-नुकुर करने लगते हैं और जरा-सा मौका मिलते ही वादे से मुकरने लगते हैं। यही बात देखने को मिली है हाल ही में, जब भारतीय और चीनी विमान कंपनियों के बीच एक-दूसरे देश में उड़ानें बढ़ाने वाला समझौता भारतीय प्रधानमंत्री की हाल की चीन यात्रा के दौरान हुआ था। जहां तक हमें याद पड़ता है सिर्फ एक भारतीय विश्लेषक ने इस संवेदनशील मुद्दे की आेर ध्यान दिलाया है कि भारत और चीन के बीच भविष्य में भीषण जल-विवाद विस्फोटक रूप ले सकता है। यह उल्लेखनीय है कि हमारे जीवन-मरण के साथ जुड़ी विशाल जलधाराएं ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सतलज वाली तिब्बत के पठार में ही जन्म लेती हैं। इन्हें अपनी जरूरत की आपूर्ति के लिए अथवा भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए बांधने के चीनियों के प्रयत्न सामरिक महत्व के ही समझे जा सकते हैं। तिब्बत के पर्यावरण के साथ खतरनाक छेड़छाड़ सिर्फ तिब्बत के मूल निवासियों के लिए ही नहीं, हमारे लिए भी घोर चिंता का विषय है। जिस घड़ी भारत सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि तिब्बत चीन की संप्रभुता के अधीन स्वायत्त भू-भाग है, उसी वक्त उसने राजनयिक दृष्टि से अपने हाथ बांध लिए थे। इस वक्त मोल-तोल के लिए हमारे पास कुछ बचा नहीं है। जहां तक विवादास्पद सीमा का प्रश्न है, चीन वह सब कुछ हासिल कर चुका है जिस पर उसका दावा था - गलत या सही और भारत को बीच-बीच में धमकाने डराने के लिए पूर्वोत्तरी राज्य और जम्मू कश्मीर राज्य का लद्दाख क्षेत्र अभी भी उसे सुलभ है। गिनती के दो चार सौ तीर्थ यात्री बमुश्किल मान सरोवर कैलाश की यात्रा कर पाते हैं हर साल, वह भी चीन के रहमोकरम से। दक्षिणा के रूप में चीन अच्छी-खासी रकम विदेशी मुद्रा में वसूलता है। हिन्दुस्तान इसी लेखे-जोखे में फंसा रहता है कि हमारे प्रक्षेपास्त्र चीन के नक्शे में कहां तक पहुंच सकते हैं! इस तरह की कसरत कबायत से चीन के नेता भारत को अपना मित्र नहीं शत्रु ही समझते हैं और उसी अनुसार उसके साथ आचरण करते हैं। हकीकत यह है कि भारत और चीन निकट भविष्य में ही नहीं सुदूर भविष्य में भी साथी-साझेदार नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धी और प्रतिद्वंद्वी ही बने रहेंगे। सस्ते मजदूर हों, कुशल श्रमिक या बड़ा बाजार, बाकी दुनिया के लिए चीन और भारत एक-दूसरे का सुखद विकल्प ही बने रहेंगे। जब तक हम इस मु़ग़ालते में है कि हमारी अंग्रेजी चीनियांे से बेहतर है या हमारी जनतांत्रिक प्रणाली पश्चिम को ज्यादा रास आती है। यह आत्ममुग्ध भाव बरकरार रह सकता है। सस्ते और कमोबेश घटिया चीनी उत्पादों से भारतीय बाजार अटे पड़े हैं। कपड़े और जूतों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक। कभी इनकी तस्करी बरास्ता नेपाल होती है तो कभी म्यांमार या थाइलैण्ड से। हुनरमंदी तो यह है कि कई चीनी उत्पाद अपना नामकरण ऐसे ब्रांडों का करते हैं कि ग्राहक को लगे वह जर्मनी या यूरोप में बने हैं। अंत में यह बात गांठ बांधने लायक है कि तिब्बतियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर भारत का चुप रहना कतई अकलमंदी नहीं। जहां तक जम्मू-कश्मीर राज्य का प्रश्न है, पूवर्ोत्तर का या अन्यत्र भारत सरकार द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के आक्षेप या आरोपों का, तो इस मौन व्रत से वे कम होने वाले नहीं। जरूरत इस बात की है कि हम चीन ही नहीं अमेरिका द्वारा इराकियों, अफगानों और फलस्तीनियों आदि के मानवाधिकारों के वंशनाशक हनन के बारे में अपना मुंह खोलना आरंभ करे। सिर्फ एक और बात जोड़ने की जरूरत है। तिब्बती गुस्से का उबाल इस वक्त इसलिए प्रकट हो रहा है कि कुछ ही महीनों बाद चीन अपनी उपलब्ध्यिों की नुमाइश के लिए आेलम्पिक खेलों का आयोजन करने जा रहा है। तिब्बतियों को लगता है कि अपनी समस्या के प्रति दुनिया का ध्यान आकषिर्त करने का इससे बेहतर मौका उसे मिलने वाला नहीं। जहां तक भारत का प्रश्न है, हमें आेलम्पिक खेलांे से रत्ती भर नफा-नुकसान होने वाला नहीं। हम इन खेलों के मैदान से बाहर हैं। सुरेश कलमाडी और केपीएस गिल जैसे खुदगर्ज खेल प्रशासकों, दरबारियों को दरकिनार करें हमें इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि दुनिया के कितने देश इन खेलों का बहिष्कार करते हैं। कुछ ही वर्ष पहले रूस और अमेरिका में प्रायोजित आेलम्पिक खेलों को भी बहिष्कार का मुंह देखना पड़ा था। हमें हर चीज का मूल्यांकन अपने राष्ट्रीय हित में ही करना चाहिए। तिब्बत की उथल-पुथल आेलम्पिक के फिजूलखर्च शोरशराबे से कहीं अधिक गंभीर मुद्दा है।ड्ढr लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं

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