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‘सनी’ की खरी-खरी

इम्पीरियल क्रिकेट कांफ्रेंस का नाम बदलकर इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल (आईसीसी) हुए चार दशक से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन अभी भी श्वेत बहुल देशों को लगता है कि क्रिकेट उनकी बपौती है। क्रिकेट की दुनिया में अपने वीटो अधिकार (जो 1में खत्म कर दिया गया) की मानसिकता से आस्ट्रेलिया व इंग्लैंड उबर नहीं पाए हैं, इसीलिए खरी-खरी कहने वाला सुनील गावस्कर उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाता। गावस्कर महान बल्लेबाज हैं, ऐसा खिलाड़ी जिसकी ट1क्कर का अपने देश में ढूंढ़ने में गोरों को दिक्कत आती है। बड़ा खिलाड़ी होने के साथ-साथ ‘सनी’ इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की नस्लभेदी मानसिकता को न केवल समझता है बल्कि समय-समय पर उघाड़ता भी रहता है। क्रिकेट जगत में गावस्कर की बातों को सम्मान से सुना जाता है। उसके भव्य अतीत के आगे बड़े-बड़े नतमस्तक हैं। पिछली जनवरी में सिडनी टेस्ट के दौरान हरभजन पर लगे नस्लभेदी टिप्पणी के आरोपों का गावस्कर ने बखूबी बचाव किया। मैच रेफरी माइक प्रोक्टर की चमड़ी खुरचने में भी वह नहीं झिझका। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत के बढ़ते रुतबे और ‘साहब ‘ देशों के घटते महत्व पर उनकी बौखलाहट का खुलासा तो उसने हाल ही में किया है। ऐसी टिप्पणियों से दुखी आईसीसी के गोरे कर्ताधर्ता गावस्कर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट समिति से बेदखल करने पर उतारू हैं। बचपना भरी हरकत है। आईसीसी की समिति में आने के बरसों पहले से वह अखबारों में कॉलम लिखने और टेलीविजन पर कमेंट्री करने का काम कर रहा है। निश्चय ही गावस्कर आइसीसी के पद के लिए अपनी लिखने-बोलने की आजादी गिरवी नहीं रखेगा। आश्चर्य की बात यह है कि उसके लिखने-बोलने पर इतने बरस बाद अचानक क्यों एतराज किया जा रहा है? लगता है भारतीय टीम के आस्ट्रेलिया दौरे के बाद विश्व क्रिकेट में काले-गोरे देशों का ध्रुवीकरण तेज हो गया है। आशा है बीसीसीआई अपने महान बल्लेबाज का साथ देगी। पचास-साठ के दशक में जिन गोरे देशों ने नस्लभेदी राष्ट्र दक्षिण अफ्रीका जाकर जमकर क्रिकेट खेली, उन्हें भारत को समानता का पाठ पढ़ाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

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