अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

राजरंग

झारखंड के मारंग गोमके दाढ़ी बाबा को गुमान था कि जो वह बोलेंगे उसे उनके शिष्य लोग मानेंगे। बाबा यह चाह रहे थे कि झार झारखंड वाला इ प्रदेश खूब विकसित करे। देश-दुनिया में इसका नाम हो, तिकड़म भिड़ा कर कमल और तीर को जमीन पर गिरा दिया और अपने चूल्हा पर खिचड़ी की हांडी चढ़ा दी। हांडी में खिचड़ी अब भी पक रही है। लेकिन अब यह खिचड़ी बेस्वाद हो रही है। हल्दी अधिक पड़ गयी, तो नमक कम। कभी चावल कच्चा रह जा रहा है, तो दाल नहीं पक रही है। परिणामस्वरूप बाबा का सपना साकार नहीं हो पा रहा है। माथा पकड़ लेते हैं, कभी-कभी कहते हैं का करें रे भाई, सब अपने मन का हो गया है। कोई बतवे नहीं मानता है। पहले वाला जमाना अब नहीं रह गया कि जो गार्जियन बोलता था, उसको सर आंखों पर रख कर परिवार के सदस्य लोग काम करते थे। सब जान रहा है अपना भविष्य कि आज हैं, तो कल रहेंगे कि नहीं, इसीलिए सब जहां काम बन रहा है, वहीं अपना दिमाग लगा रहा है। ऐसे में कहां से झार झंखाड़ में बहार आयेगी। हरी-भरी वादियों वो इस प्रदेश में फिर से मांदर की थाप और बांसुरी की धुन गूंजेगी। चौपालों से निकले लोकगीतों का सुमधुर स्वर शहर तक पहुंचेगा। इस सब लगता है कि सपने रह जायेगा। सबको मिला कर एक कमेटी भी बनायी, लेकिन कोई माने तब तो। कमेटी बैठती ही नहीं है। लगता है कि ऐसे ही चलता रहेगा सब।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: राजरंग