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बिहार सरकार को 607 करोड़ का नुकसान

नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने वर्ष 2006-07 में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा 451.44 करोड़ रुपये के खर्च पर आपत्ति जताई है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न स्तरों पर लापरवाही के कारण राज्य सरकार को गत वित्तीय वर्ष में 607 करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा राज्य सरकार ने वर्ष 2006-07 में कुल राजस्व का मात्र 20 प्रतिशत ही राजस्व जुटाया है। सीएजी की यह रिपोर्ट बुधवार को विधानमंडल के दोनों सदनों में रखी गई। नीतीश सरकार के कार्यकाल की पहली सीएजी रिपोर्ट होने के कारण इसे काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।ड्ढr ड्ढr महालेखापरीक्षक अरुण कुमार सिंह ने बुधवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वर्ष 2005-06 की तुलना में वर्ष 2006-07 में राज्य की राजकोषीय स्थिति में सुधार हुआ है। लेकिन उन्होंने इसका कारण केन्द्र सरकार से मिली राशि को बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष भारत सरकार से सहायता अनुदान के रूप में 57.4 प्रतिशत और केन्द्रीय करों से 27.6 प्रतिशत हिस्सा पिछले वर्ष के मुकाबले ज्यादा मिला। उन्होंने बताया कि वर्ष 2006-07 में बिहार सरकार को कुल 23,083.1रोड़ रुपये का कुल राजस्व प्राप्त हुआ। इसमें राज्य सरकार ने 4, 544.36 करोड़ रुपये का अपना राजस्व जुटाया। दूसरी तरफ भारत सरकार से 18,538.83 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इसमें संघीय करों से राज्य के हिस्से के रूप में 13,2रोड़ रुपये और सहायता अनुदान के रूप में 5,247.11 करोड़ रुपये शामिल थे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2006-07 के दौरान बजट का कुल प्रावधान 34,047.33 करोड़ रुपये का था और इसमें 27,143.57 करोड़ रुपये व्यय हुए।ड्ढr ड्ढr उन्होंने बताया कि वाणिज्य कर विभाग, राज्य उत्पाद, वाहनों पर कर, भू राजस्व, अलौह खनन और अन्य विभागीय अभिलेखों की जांच के दौरान 607.01 करोड़ रुपये के नुकसान के 4,643 मामले सामने आए। राज्य सरकार ने भी 746 मामलों में 237.82 करोड़ रुपये के नुकसान को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने इस वर्ष 17 कंपनियों को बंद करने का फैसला लिया। इसमें सरकारी पूंजी और कर्ज मिलाकर कुल निवेश 548.4रोड़ रुपये का था।ड्ढr ड्ढr बिजली बोर्ड को 5.5 करोड़ की चपतड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। बड़े लोगों पर मेहरबानी की वजह से बिजली बोर्ड के करोड़ों रुपए डूब गए। यह मेहरबानी एक या दो जगहों पर नहीं बल्कि दो दर्जन से अधिक विद्युत प्रमंडलों व अंचलों में बोर्ड अधिकारियों ने अपनीजांबाजी से बिजली बोर्ड को 5.5 करोड़ की चपत लगादी। नियमों को ठेंगा दिखाने वाले इन बोर्डकर्मियों पर न तो कोई जिम्मेवारी तय की गयी और न ही उन्हें दंडित किया गया जबकि ऐसी डूबी राशि को संबंधित अधिकारियों से वसूले जाने तक का नियम है। बोर्ड कर्मियों ने ऐसे दोषी बड़े उपभोक्ताओं के खिलाफ मनी सूट दायर नहीं किया, जिससे बोर्ड के करोड़ों रुपए डूबे।ड्ढr ड्ढr भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक ने बोर्ड की इस अनोखी कारस्तानी को भी पकड़ा है। सीएजी ने फरवरी 2001 से मार्च 2003 की अवधि में 12 आपूर्ति प्रमंडलों कंकड़बाग, डेहरी ऑन सोन, दरभंगा, मधुबनी, गया, मोतिहारी, आरा, भागलपुर, मधेपुरा, जहानाबाद, सुपौल और बरौनी के कालबाधित दावों की पंजी नमूना जांच के क्रम में भारी गड़बड़ी पाई है। जांच में यह पाया गया कि समय पर 41 निम्न विभव औद्योगिक सेवा, 481 गृह सेवा, तीन सिंचाई व कृषि सेवा, नौ औद्योगिक तथा 170 वाणिज्यिक सेवा उपभोक्ताओं के विरुद्ध समय पर मनी सूट दायर नहीं किया गया। इससे दो करोड़ रुपए से अधिक का चूना बोर्ड को लगा।ड्ढr ड्ढr एक अन्य मामले में इसी तरह अप्रैल 2005 से मार्च 2006 की अवधि में छह विद्युत अंचलों आरा, बिहारशरीफ, मुजफ्फरपुर, पटना (पूर्व), समस्तीपुर व पूर्णिया और छह विद्युत प्रमंडलों बिहारशरीफ, बक्सर, गर्दनीबाग, गुलजारबाग, जहानाबाद व पूर्णिया के विपत्रों की जांच के बाद पाया गया कि वहां भी 5एचटी व 168 एलटीआईएस उपभोक्ताओं के विपत्रों की राशि उनकी प्रतिभूति जमा राशियों से 20 फीसदी से अधिक हो गई थी, की राशि को नहीं बढ़ाया गया। इससे तकरीबन 3.55 करोड़ रुपए की चपत बिजली बोर्ड को लगी।

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