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तिब्बत में सुलगती जनांदोलन की आग

तिब्बत की राजधानी ल्हासा में बौद्ध भिक्षुआें ने चीन सरकार के खिलाफ जो प्रदर्शन गत 10 मार्च को शुरू किया वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा। 1में तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने दस मार्च को ही तब अपना महल छोड़ दिया था, जब उन्हें पक्का पता लगा था कि चीनी फौजी उन्हें गिरफ्तार कर बीजिंग ले जाना चाहते थे। दलाई लामा ने भारत में शरण ली। तब से आज तक दलाई लामा को लेकर भारत-चीन संबंध कटुतापूर्ण हैं। हाल के वषरे में खासकर जब से देंग सत्ता में आए तब से दोनों देशों के संबंधों में थोड़ा सुधार हुआ है। पर दलाई लामा को लेकर किरकिरी तो बनी ही हुई है। चीन का आरोप है कि दलाई लामा के भड़काने पर ही तिब्बतियों ने आंदोलन तेज किया है। दलाई लामा कहते हैं कि चीन किसी भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी से जांच करा ले, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। वे कहते हैं कि चीन के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उसमें उनका हाथ नहीं है। 1में जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी तिब्बत में घुस गई तब से उसने तिब्बतियों पर अवर्णनीय जुल्म ढहाए। बौद्ध मठों को बेरहमी से ध्वस्त किया, निदर्ोष बौद्ध भिक्षुआें को गिरफ्तार कर उन्हें यातनाएं दीं। चीन की सरकार ने दमनकारी रवैया अपनाते हुए तिब्बत की प्राकृतिक संपदा का पूरी तरह दोहन करने के भी कई हथकंडे अपनाए। तिब्बत के जंगलों में ताम्बे-चांदी के विशाल भंडार हैं, जिनका खनन कर वे कच्चे माल को चीन की मुख्य भूमि की ओर लाने लगे। तब तिब्बतियों ने विरोध किया, पर सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी। इस बीच चीन की सरकार ने चीन की मुख्य भूमि से तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक रेल लाइन बिछा दी। सब इतना गुपचुप हुआ कि बाहर के संसार को भनक भी न लगी। कई साल बाद जब कनाडा के कुछ इंजीनियर जो इन रेल लाइनों को बिछाने के कार्य का निरीक्षण कर रहे थे, बाहर आए तब उन्होंने ही भेद खोला कि चीन ने अपनी मुख्य भूमि से ल्हासा तक दुर्गम पहाड़ियों पर पुल बनाकर लम्बी रेल लाइन बिछाई है, जिसके कारण तिब्बत के खनिज बड़े पैमाने पर सस्ती दरों पर चीन की मुख्य भूमि पहुंचेंगे और स्थानीय तिब्बती और गरीब हो जाएंगे। इस रेल द्वारा से लाखों सैलानी हर साल ल्हासा आते जाते हैं। जब से चीन में आर्थिक उदारीकरण के बाद सैलानियों की सुविधा के लिए अनेक मठों को ढहा कर उनकी जगह पांच सितारे और तीन सितारे वाले होटल बनाए गए जिनके मालिक चीनी मुख्य भूमि के उद्योगपति हैं। यही नहीं, मुख्य भूमि से ‘हान’ जाति के चीनी लाखों की संख्या में तिब्बत में लाकर बसाए गए। आज तिब्बत का यह हाल है कि वहां ‘हान’ जाति के चीनियों की संख्या अधिक है, मूल तिब्बती अल्पसंख्यक हो गए हैं। अपनी समृद्धि के लिए चीन ने तिब्बत की प्राकृतिक संपदाआें का भरपूर दोहन किया है। चीन सरकार ने बड़ी होशियारी से तिब्बत के स्थानीय लघु उद्योगों को समाप्त करके वहां ‘मिनरल वाटर’ के बड़े-बड़े प्लांट लगा दिए जिसमें शत-प्रतिशत मजदूर चीन से लाए गए। इस मिनरल वाटर की मांग विदेशों में बहुत है। इसका फायदा चीनी उद्योगपतियों को हो रहा है, स्थानीय तिब्बती पहले की तरह ही गरीब हैं। चीन में पानी का बड़ा अकाल है। उसकी प्रसिद्ध ‘येलो रिवर’ सूख गई है। पश्चिमी मीडिया ने कुछ अरसे पहले यह रहस्योद्घाटन किया था कि चीन ब्रह्मपुत्र की धारा को मोड़कर उत्तर की आेर ले जाएगा और वह पानी ‘येलो’ रिवर में गिरेगा जिससे न केवल सिंचाई होगी बल्कि बड़े पैमाने पर बिजली भी बनेगी। जब भारत में इसका कड़ा विरोध हुआ तो चीन ने सफाई दी कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है। परंतु सच्चाई है कि इंजीनियरों ने इस योजना पर काम शुरू कर दिया है। तिब्बत से एक दूसरी बड़ी नदी निकलती है ‘मेकांग’ जो लाआेस, थाईलैंड, कम्बोडिया और वियतनाम होकर समुद्र में जा मिलती है। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को सिंचाई और बिजली के लिए पानी मेकांग से ही मिलता हे। थाईलैंड अपनी जरूरत की 0 प्रतिशत बिजली लाआेस से आयात करता है। इसका उत्पादन मेकांग नदी पर बांध से होता है। चीन ने मेकांग नदी के तट पर तिब्बत में ही डेम गुपचुप बनाया है जिससे बेशुमार बिजली का उत्पादन होता है और वह बिजली चीन की मुख्य भूमि के औद्योगिक विकास में काम आती है। जहां तक तिब्बत में, खासकर ल्हासा में बौद्ध भिक्षुआें के प्रदर्शन का सवाल है, तय है कि फिलहाल ताकत के बल पर चीन इस आंदोलन को दबा देगा। पर अब समय बहुत बदल गया है। आंदोलन की यह आग शीघ्र बुझने वाली नहीं है।ड्ढr लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं

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