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साा का सच

भारतीय संविधान में कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र के विभाजन के बावजूद किसी एक अंग द्वारा दूसरे के क्षेत्राधिकार की सीमा लांघने के विवाद होना दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, लोकतंत्र के लिए एक अशुभ संकेत भी है। विशेषाधिकार हनन के आरोप में महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा राज्य के चुनाव आयुक्त नंदलाल को दो दिनों की जेल की साा देने से कार्यपालिका और विधायिका के बीच निर्थक टकराव पैदा हुआ है। इस मामले में राज्य विधानसभा और नंदलाल दोनों के तर्क अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं, पर इतना स्पष्ट है कि विधानसभा की विशेषाधिकार समिति ने नंदलाल को उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का मौका दिया था। वह इसका उपयोग कर अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते थे, पर उन्होंने हठधर्मी रवैया अपनाकर उसका लिखित जवाब अपने मातहत अधिकारी की ओर से दिलवाया। यह कदम उचित नहीं, क्योंकि विधायिका की अपनी गरिमा और महत्व है, जिसका उन्हें सम्मान करना चाहिए था। इसके बावजूद यह सच है कि चुनाव आयुक्त कार्यपालिका व विधायिका के बीच एक कड़ी होता है। वह अपने अधिकारों के मामले में स्वायत्त होता है। इसी वजह से अनेक कानूनी विशेषज्ञों की राय है कि यदि नंदलाल ने राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव में कोई गलत आदेश जारी किया था तो कोर्ट में उसे चुनौती दी जानी चाहिए थी। यह बात सामने आई है कि उन्होंने 2006 में स्थानीय निकायों के मेयर, डिप्टी मेयर और सरपंच जैसे पदों पर भी चुनाव आयोग की निगरानी का आदेश दिया था, जो विधानसभा के अनुसार गलत था। इसी मसले पर विधानसभा की विशेषाधिकार समिति ने उन्हें तलब किया था। यदि वाकई ऐसा है तो इस आदेश को विधानसभा ने अपने विशेषाधिकार का हनन कैसे मान लिया? क्या राज्य सरकार या नंदलाल के आदेश से प्रभावित होने वाले मेयर, डिप्टी मेयर और सरपंच पद के उम्मीदवार कोर्ट में उसे चुनौती नहीं दे सकते थे? नंदलाल का कहना है कि लातूर विधानसभा क्षेत्र के परिसीमन को लेकर मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख के साथ उनकी तनातनी के कारण उन्हें दंडित किया गया है। यदि ऐसा है तो यह संवैधानिक विवाद के बजाए अहम का मामला अधिक नजर आता है, जिससे बचा जा सकता था।

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