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रंगमंच के रहनुमा हैं हबीब तनवीर

हबीब तनवीर 85वें वर्ष में चल रहे हैं, पर इस उम्र में भी उनकी रंग सक्रियता अवाक् कर जाती है। अप्रैल के दूसरे हफ्ते वे अपनी नई रंग प्रस्तुति ‘राजरक्त’ लेकर बिहार के बेगुसराय में जा रहे हैं। यह नाटक रवींद्रनाथ ठाकुर की कृति पर आधारित है। जीवन की सांध्य बेला में हबीब कदाचित् रवींद्रनाथ की ओर इसलिए मुड़े क्योंकि गुरुदेव उन्हें गांधी की तरह अहिंसा के पैरोकार लगे। रवींद्रनाथ ने 1887 में ‘राजर्षि’ नामक उपन्यास लिखा था और तीन साल बाद 180 में उसे ‘विसर्जन’ शीर्षक से नाटक का रूप दिया था। इसी उपन्यास व नाटक को हबीब ने ‘राजरक्त’ के नाम से तैयार किया है। यह नाटक बताता है कि कुछ लोग धर्मान्धता और हिंसा का वातावरण बनाने में संलग्न हैं। क्या 1वीं शताब्दी का यह यथार्थ आज 21वीं शताब्दी की भी वास्तविकता नहीं है? लोकनाटय़ से लेकर शास्त्रीय-आधुनिक रंगमंच तक फैले अपने व्यापक और दीर्घ रंग अनुभव के जरिए हबीब इस नवीनतम रंग प्रस्तुति में एक नए रंग आस्वाद से दर्शकों को समृद्ध कर जाते हैं। अपने दीर्घ रंग जीवन में हबीब तनवीर ने पहली बार रवींद्रनाथ की कृति का मंचन किया है और इसे उन्होंने भोपाल में या छत्तीसगढ़ में बैठ कर नहीं तैयार किया। इसके लिए वे तीन साल पहले रवींद्रनाथ के गृहप्रदेश में आए। हबीब ने कोलकाता में महीनों रह कर ‘विसर्जन’ तैयार किया था। बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में इसे ‘राजरक्त’ के नाम से तैयार किया। डेढ़ साल पहले उसे उन्होंने कोलकाता में मंचित किया था। इस उम्र में हबीब ‘राजरक्त’ की प्रस्तुति के जरिए यदि अहिंसा के ‘सत्य’ का पैरोकार बनते हैं और दर्शकों को भी उस ओर मोड़ने की गंभीर कोशिश करते हैं, तो इसलिए कि इस सत्य का संधान कोई कलाकार लंबी साधना के बाद कर पाता है। हबीब की रंग यात्रा के ठीक साठ साल पूरे हो रहे हैं। हबीब ने अपने रंग जीवन की ठोस शुरुआत 1में मुंशी प्रेमचंद की महान कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर आधारित ‘शतरंज के मोहरे’ नाटक के मंचन से की थी। उसके बाद तो वे रंगमंच के लिए ही पूरी तरह समर्पित हो गए। उन्होंने छह दशकों की रंग यात्रा में कुल 50 नाटक तैयार किए, जिसमें ‘चरन दास चोर’, ‘आगरा बाजार’, ‘बहादुर कलारिन’, ‘हिरमा की अमर कहानी’, ‘मृच्छकटिकं’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘उत्तर रामचरित’, ‘प्रतिमा नाटक’, ‘वेणी संहार’, ‘दुश्मन’, ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जन्म्या ही नइ’ आदि के अनेक बार मंचन हुए। इन नाटकों के मंचन के जरिए हबीब तनवीर ने अपनी एक भिन्न रंग शैली और अनोखा रंग व्याकरण रचा। इसीलिए रंग जगत में वे सबसे अलग और अकेले और अद्वितीय नजर आते हैं। हबीब भारतीय रंग मंच के रहनुमा हैं। हबीब तनवीर ने लंबे कालखंड के परिवर्तनों को जिया है। देश विभाजन के समय भीषण रक्तपात देखा। विभाजन का दर्द उन्हें हमेशा सालता रहा। इसीलिए आजीवन हबीब जोड़ने के काम में लगे रहे। उन्होंने भारतीय रंगमंच को लोक से जोड़ा और लोक और आधुनिकता के बीच भी अनूठा सेतु निर्मित किया। उन्होंने रंगमंच में मौलिकता और प्रयोगधर्मिता को इस तरह प्रतिष्ठित किया कि जीते जी किंवदंती हो गए। उन्होंने दुनिया की कई भाषाओं को भी अपने रंगमंच से जोड़ा। अंग्रेजी में ‘टेमिंग ऑफ द थ्रू’, ‘ए सरवेन्ट ऑफ टू मास्टर्स’, ‘दे शू मेकर्स प्राडिजियस वाईफ’ और ‘द इम्पाटेंस ऑफ बिंग ऑनेस्ट’ का मंचन किया तो उर्दू में ‘सूत्रधार’, ‘राजा चंबा और चार भाई’, ‘जालीदार पर्दे’, ‘रुस्तम सोहराब’, ‘देख रहे है नैन’, ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जन्म्या ही नइ’ और ‘एक औरत हिपेशिया भी थी’ का मंचन किया। उन्होंने ओड़िया में ‘प्रहलाद नाटक’ और हरियाणवी में ‘जानी चोर’ खेला तो संस्कृत में ‘मुद्राराक्षस’, ‘उत्तर रामचरित’। हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में तो उन्होंने अनेक नाटकों का मंचन किया। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। गद्य और पद्य दोनों विधाओं में। हबीब तनवीर से उनकी रचनाएं सुनना हमेशा यादगार अनुभव होता है। उनके साथ अड्डेबाजी करने का सुख मुझे कई बार मिला है। भोपाल में कुछ साल पहले उनके साथ लंबी अड्डेबाजी हुई थी, जिसमें हबीब की बेटी नगीन तनवीर ने कई सुमधुर गीत सुनाए थे। उस अड्डेबाजी की स्मृतियां मेरे लिए अनमोल धरोहर हैं। कोलकाता-दिल्ली में भी पिता-पुत्री से भेंट होती रही। अभी पिछले दिनों दिल्ली प्रेस क्लब में आयोजित परिसंवाद में हबीब ने कितनी साफगोई और बेबाकी से तसलीमा नसरीन को कोलकाता जाने देने और वहां उन्हें सामान्य जीवनयापन करने देने की जोरदार मांग की थी और कहा था कि वामपंथी होने के नाते ही वे यह मांग कर रहे हैं। हबीब फक्कड़ हैं। आधुनिक कबीर हैं। साहित्य-कला-संस्कृति को उन्होंने बहुत कुछ दिया है। हमारी कामना है कि साहित्य-कला-संस्कृति को वे और समृद्ध करें।

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