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पाकिस्तान में नई सरकार : शपथग्रहण समारोह के निहितार्थ

पत्रकारिता के छात्रों को एक बुनियादी बात देर-सबेर जरूर बताई जाती है, वह यह कि एक अच्छी स्टोरी सामान्य घटनाक्रम से नहीं सामान्य दिखने वाली घटना के असामान्य पहलू से ही निकलती है। यानी चोर आए थे और कुत्ता भूंका था, यह तो सामान्य और प्रत्याशित घटनाक्रम है, इससे रपट नहीं बनती। स्टोरी में गहराई तो तब बनती है, जब पता चले कि चोरी तो हो गई पर घर में मौजूद होते हुए भी कुत्ता नहीं भौंका। ‘व्हाई द डॉग डिडन्ट बार्क?’ यह सवाल सचाई के अनुसंधानी पत्रकारों के लिए बड़े मार्के का सवाल है। अभी हाल में 25 मार्च को अमेरिका समर्थित मुशर्रफ सरकार के खिलाफ लंबी और हिंसक लोकतांत्रिक लड़ाई के बाद चुनी गई पीपीपी के वरिष्ठ सदस्य यूसुफ रजा गिलानी को राष्ट्रपति मुशर्रफ ने देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। सामान्य उम्मीद के ठीक उलट उस ऐतिहासिक घड़ी में वहाँ उनकी पार्टी पी.पी.पी. या सत्ता में साझीदार पी.एम.एल. का तो कोई भी शीर्ष नेता मौजूद न था। अलबत्ता व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव का अमेरिका सरकार की आेर से वक्तव्य तुरत आ गया कि अमेरिका के नई सरकार के साथ ‘पहले से’ अच्छे रिश्ते हैं और यह सिलसिला जारी रहेगा। लोकतांत्रिक सरकार की पुनस्र्थापना की घड़ियों में इस अप्रत्याशित घटनाक्रम की वजह क्या थी? यह जानना पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के असली स्वरूप और कबीलाई कार्यशैली पर से पर्दा उठा सकता है। जिस दिन गिलानी शपथ लेने वाले थे, भुट्टो या शरीफ समारोह से दूर ही रहे। उसी दिन एक और छोटी सी खबर भी छपी। वह यह, कि शपथग्रहण के तुरत बाद नए प्रधानमंत्री अपने बेटे अब्दुल कादिर गिलानी की शादी में जाएंगे, जो उसी दिन पाकिस्तान के शीर्ष धर्मगुरु पीर पगारो की पोती से होने वाली थी। पाकिस्तान के बेहद महत्वपूर्ण और सम्पन्न पगारो परिवार से गिलानी परिवार के गहरे रिश्ते हैं। धर्मगुरु पीर पगारो की पूर्व पत्नी गिलानी की मौसी हैं। यानी गिलानी की सियासी ताकत बढ़ाने वाला धर्म और सियासत का प्रगाढ़ रिश्ता वहाँ अभी भी लोकतंत्र पर हावी रहेगा। भुट्टो, जरदारी, शरीफ तथा गिलानी परिवारों की ऐसी रिश्तेदारियाँ उनकी कबीलाई दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ और सामंती संस्कार ही आगामी दिनों में पाक सियासत में भी उनके लिए ज्यादा महत्व रखेंगे। लोकतंत्र की दृष्टि से दूसरा गौरतलब तत्व है वह भ्रष्टाचार का साया, जो पाक नेताआें के साथ हमेशा रहा है। वर्तमान् पाक प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में मुशर्रफ ने 5 बरस जेल में रखा था। और 1में बेनजीर भुट्टो की सरकार को भी अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया की तीन भ्रष्टतम सरकारों में गिना था, (भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी तब तक स्वदेश में ‘मिस्टर टेन पर्सेट’ नाम से मशहूर हो चुके थे।) भुट्टो के बाद सत्तारूढ़ हुए नवाा शरीफ से अवाम को बेहतरी की उम्मीद थी, लेकिन जल्द ही उनके निााम में भी वैसा ही व्यापक भाई-भतीजावाद, पत्रकारों (जैसे फ्राइडे टाइम्स के संपादक नजम सेठी) की नजरबंदी और न्यायपालिका की आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिशें देखने में आईं। इन्हीं का फायदा उठाते हुए तख्तापलट कर जनरल मुशर्रफ सत्ता में आए। भुट्टो तथा शरीफ परिवार इसके बाद अपनी यूरोप की कोठियों में जा बसे। और जब लोकतांत्रिक चुनावों की पीठिका बन चली, तो अपने विदेशी ठिकानों से निकले और स्वदेश आ पहुँचे। और एक बार फिर इन दोनों के भी मुशर्रफ तथा व्हाइट हाउस से अवसरवादी गुप्त समझौतों की खबरें मिलने लगीं। भुट्टो की हत्या ने पुराने शत्रुआें : जरदारी और नवाज शरीफ को हाथ मिलाने पर मजबूर कर दिया। और चुनाव हुए। इसे लोकतंत्र की जीत बताते हुए उनकी पार्टियों द्वारा भरपूर जश्न भी मनाए गए। लेकिन सत्ता में फिर वही ढाक के तीन पात : मुशर्रफ, जरदारी (+भुट्टो) और शरीफ परिवार शीर्ष पर दिखते हैं। बेचारे गिलानी की बिसात खड़ाऊँ प्रतिनिधि की ही है। और मलाईदार पदों के लिए उनकी सरकार में झगड़े भी शुरू हो गए हैं। जनाक्रोश की जिस प्रचंड आँधी ने पाकिस्तान में इस बार बरसों बाद फिर लोकतांत्रिक चुनाव कराए हैं, वह दरअसल एक लावारिस आँधी है जिसकी ऊर्जा को भुनाने वाले नेताआें, न्यायपालिका और अंग्रेजी मीडिया में से किसी में भी उसका सच्चा अभिभावक बनने की कोई दीर्घकालिक रुचि नहीं है। जरदारी से शरीफ तक सभी नेता एक सीमित-सम्पन्न सामंती इलीट के वर्गगत हितों के रक्षक हैं। रही न्यायपालिका, लेखक और ख्यातनामा पत्रकार, तो यहाँ से वहाँ तक परख लीजिए जिन-जिन के नाम इधर सुर्खियों में आए हैं, वे सभी गिलानी की ही तरह कहीं न कहीं कराची, लाहौर और इस्लामाबाद की इसी रूलिंग इलीट से जुड़े, और विलायत तथा पाकिस्तान के मँहगे पब्लिक स्कूलों से पढ़ कर निकले प्रमाणित होंगे। आने वाले दिनों में भी इस नेतृत्व का जनता तथा लोकतंत्र से कोई संवादपूर्ण गहरा रिश्ता बन सकेगा, इसमें शक है। किसी गाँधी या जेपी द्वारा नहीं चन्द लावारिस भावनात्मक आँधियों द्वारा ही समय-समय पर पाकिस्तान के अनगढ़ राजनैतिक भूगोल में फौरी निर्माण के दौर आएंगे। यह बात पाकिस्तान के भाग्य में तभी लिख दी गई थी, जब सिर्फ चन्द सामंती पृष्ठभूमि के विलायतपलट नेताआें द्वारा एक साल के भीतर मुसलमानों के बीच उपजाई एक उत्कट नफ़रत की आंधी से बिना तटस्थ, विचार या दृष्टि के उस देश का हठात् जन्म हो गया था। अगर आम पाकिस्तानी को लग रहा है, कि बेनजीर के बाद जरदारी, शरीफ और मुशर्रफ़ सभी अपनी खालें बचाने के लिए अमेरिका की गोद में जा बैठे हैं, और जनभावनाआें से लापरवाह होकर कहीं न कहीं अमेरिका से गुप्त कौल-करार करके देश की स्वायत्तता गिरवी रख चुके हैं तो यह पूरी तरह गलतफहमी भी नहीं। इस बार भी पाक के आम चुनावों की जड़ में भी वर्तमान् सियासी बिसात को जैसे-तैसे उलटने की उतावली ही अधिक प्रबल थी, आने वाले लोकतंत्र का कोई व्यापक और सर्वसम्मत ब्लू-प्रिंट जनता तथा नेताआें द्वारा बनाया जाना अभी भी शेष है। गिलानी या जरदारी (पिता-पुत्र) या शरीफ आँधी के बीच कभी-कभी आम जन की अंधेरी दुनिया के प्रवक्ता भले ही बन जाएं, लेकिन खुद वे उसके नागरिक नहीं हैं, और न ही बनने की इच्छा रखते हैं। अगर रखते, तो पाकिस्तान की जनभाषाआें का पंजाबी, सिंधी प्रश्ती मीडिया, जो वहाँ की नब्बे प्रतिशत अवाम की भावनाआें का असली अक्स है, वहाँ के उदारवादी अंग्रेजी मीडिया के विपरीत इन नेताआें से इतना सशंक और इतना प्रतिगामी, उग्र, कट्टरपंथी और जनूनी इस्लामपरस्ती से भरपूर न दिखाई देता। अगर बेनजीर भुट्टो की हत्या न होती, और वे राष्ट्र प्रमुख बन जातीं तो उन्होंने भी इस बार क्रांतिकारी बदलाव लाने का ऐसा क्या संकेत दिया था? मरते-मरते भी वे पार्टी के नेता पद की वसीयत अपने बेटे के ही नाम कर गईं और किसी ने गला तक नहीं खँखारा। अठारह फरवरी 2008 को हुए चुनावों में पाक अवाम ने मुस्लिम लीग (कायदे आजम) के विश्वबैंक पलट शौकत अजीज और मुशर्रफ के साथ-साथ जनसामान्य और इलीट के बीच की दरार को भी उजागर किया है। और गिलानी के नेतृत्व में और लोकतंत्र में भी यह दरार नहीं पाटी गई, तो शायद उन्हें कठोर धार्मिक अनुशासन और जीवन में सादगी के पैरोकार तालिबान को सर आंखों पर बिठा कर सत्ता में लाने में देर न लगेगी, भले ही इसके बाद उनका जीवन कितना ही दुश्वार और देशका कितना ही बंटाढार क्यों न हो जाए। आखिर 1में नवाज शरीफ़ की लोकतांत्रिक सरकार से कुढ़े बैठे लोगों ने भी तो जनरल मुशर्रफ को रक्तहीन क्रांति से लोकतंत्र की हत्या की मूक स्वीकृति दे दी थी।ं

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