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खबर का बढ़ता धंधा, घटता कद

एक और बच्चा बोरवेल में गिरा। जब उसे निकाला गया, आठ हिन्दी और अंग्रेजी चैनल और कुछ नहीं दिखा रहे थे। सबका कैलकुलेशन था कि इस वक्त और कुछ दिखाने से दर्शक रिमोट कंट्रोल उठा कर उस चैनल पे जाएंगे, जहां यह कहानी दिखाई जा रही है। कैमरे टिके रहे जब तक एम्बुलेंस का दरवाजा बंद नहीं हुआ। फिर कुछ चैनल बच्चे को निकाले जाने का फुटेज दोबारा दिखाने लगे। रिपोर्टर्स एम्बुलेंस के अंदर बैठे लोगों को मोबाइल फोन पर कान्टेक्ट करने में जुटे रहे। एम्बुलेंस के अंदर से डॉक्टर ने कहा, देखिए, अभी मुझे बच्चे को ट्रीट करने दीजिए। मैं आपसे बाद में बात करूंगा। हमारे मेहनती टीवी रिपोर्टर इस बात को समझने लगे हैं कि जब इस तरह की ‘रियलिटी टेलीविजन’ जैसी स्टोरी हो तो उनका काम है कि किसी भी तरह दर्शकों को पकड़े रखना, ताकि वे चैनल न बदलें। चैनल मैनेजमेंट उन्हें यही सिखाता है। आज के जमाने में न्यूज का कमर्शियल लॉजिक यही है। जब यह ड्रामा हो रहा था उसी दिन मुंबई में मीडिया के एक बड़े सम्मेलन फिक्की फ्रेम्स 2008 में न्यूज पर एक पैनल डिस्कशन हुआ जिस में टीवी टुडे, एनडीटीवी, सीएनएन, सहारा इत्यादि के लोगों ने भाग लिया। जिसमें टीवी टुडे ग्रुप के सीईआे जी. कृष्णन ने कहा : ‘विज्ञापन देने वालों के लिए टेलीविजन का रिमोट कंट्रोल पत्रकार की कलम से ज्यादा प्रभावशाली है।’ उन्होंने यह भी कहा : ‘सबसे ज्यादा दर्शक पाने के लिए घटिया खबर दिखाना भी कभी-कभी जरूरी होता है।’ इस में एनडीटीवी इंडिया के सज्जन का कहना था कि जिस खबर में ज्यादा ‘आईबाल्स’ (यानी दर्शक) जुटने की गुंजाइश है, उसको ज्यादा महत्व देना पड़ेगा। बेनजीर भुट्टो की हत्या को ज्यादा एयरटाइम मिलेगा, भूटान में डेमोक्रेसी आने की खबर को कम। सहारा समय के उपाध्यक्ष ने इस बातचीत में कुछ आंकड़े पेश किए, जिससे यह साबित होता है कि कमर्शियल लॉजिक के अनुसार आजकल ज्यादातर टीवी चैनल जो रास्ता अपना रहे हैं, वह सही है। 2007 में टेलीविजन पर विज्ञापन का जो कुल खर्च हुआ, उसका 10-12 प्रतिशत न्यूज चैनलों ने कमाया। और 2007 में न्यूज चैनलों ने 700 करोड़ रुपए के करीब कमाई की। 2006 में यह आंकड़ा 620 करोड़ रुपए था। अगर आप उस तरह का खबर दिखाते रहेंगे जो दर्शक को आकर्षित करती है, तो आपकी आमदनी बढ़ती जाएगी। तो एक तरफ हुई खबरों पर नियंत्रण की बात और दूसरी तरफ है मीडिया टेक्नोलॉजी की बात, इस पर भी फिक्की फ्रेम्स में काफी चर्चा हुई। भविष्य की टेक्नोलॉजी में निवेश होगा, मोबाइल टीवी, इंटरनेट प्रोटोकॉल टीवी, इत्यादि। हिन्दुस्तान में दुनिया के बड़े बड़े इन्टरटेनमेंट कारपोरेशन निवेश करने आ रहे हैं, वे यहां की मीडिया कंपनियों में शेयर खरीद रहे हैं, और भविष्य के मीडिया प्लेटफार्म्स के लिए निवेश किया जा रहा है। पिछले हफ्ते यूरोपियन यूनियन के कमिश्नर फॉर इन्फारमेशन सोसाइटी एंड मीडिया यहां आई। बातचीत में इस महिला ने अपनी दिक्कत प्रकट की कि हिन्दुस्तान की ब्राडबैंड की पहुंच इतनी कम है, और स्पीड इतनी धीमी है। उनका कहना था कि चीन और सिंगापुर में कम्युनिकेशन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर इस स्तर पर ले जाया गया है कि उस देश के लोग यूरोप के हाई स्पीड प्लेटफार्म्स को एक्सेस कर सकता है, पर हिन्दुस्तान में अभी हम इस मामले में बहुत पीछे हैं। उन्होंने बताया कि दुनियाभर में लोग इंटरनेट द्वारा टीवी देख सकते हैं। यहां पर विडंबना यह है कि मान लीजिए स्पीड कम्युनिकेशन्स में निवेश भी होने लगा तो आखिर हम उसे इस्तेमाल किसलिए करेंगे? लोगों को घटिया खबर दिखने के लिए, क्योंकि रिमोट कंट्रोल ज्यादा प्रभावशाली है, चाहे वह कंप्यूटर के लिए हो या टीवी के लिए? टीवी टुडे का अंग्रेजी चैनल हैडलाइन्स टुडे कुछ दिनों से एक विज्ञापन दिखाता रहा है, जिसमें दूसरे न्यूज चैनलों का मजाक उड़ाया जाता रहा है कि वे सब बेकार चैनल हैं। टीवी स्क्रीन पर तीन चार जाने माने एंकरों से मिलते-जुलते लोगों को दिखाया जाता है, ब्लॉह ब्लॉह यानी बेकार की बातें कहते हुए। और आखिर में कहा जाता है कि हैडलाइन टुडे इन सबसे हटके है। किस तरह से कहते हैं? आप खुद ही देख लीजिए।ड्ढr जहां अखबारों का सवाल है, इस सम्मेलन में मलयाला मनोरमा के चेयरमैन और एमडी ने कहा कि आजकल अखबारों में भी वैसी ही बीमारी चली है। वे भी विज्ञापन से संचालित होने में लगे हैं, खबरों की ताकत के बल पर नहीं। उन्होंने अफसोस जताया कि आजकल लोग चाहते हैं कि अखबार चीज बेचें, यह नहीं चाहते कि उनकी खबरों पर असर डालें। मीडिया उद्योग तेजी से बढ़ रहा है। बैलेंस शीट में उसकी वैल्यू बढ़ रही है, लेकिन महत्व घट रहा है।

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