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नोन-तेल-लकड़ी

मुल्क की पब्लिक को एक बात के लिए महंगाई के आंकड़े का शुक्रगुजार होना चाहिए। यह आंकड़ा सातवें आसमान में उड़ने वाली हमारी सरकार को कुछ वक्त के लिए जमीन पर उतार देता है। ग्लोबल इंडियन टेकआेवर, करिश्माई शेयर बाजार और एशियन संेचुरी की बड़बोली शब्दावली अचानक पर्दे के पीछे चली जाती है। नींद से जागता निजाम देखता है कि अरे, मुल्क की हैसियत तो आज भी तीसरी दुनिया के एक सामान्य देश वाली ही है। आज भी देश नोन-तेल-लकड़ी के दाम बांधने जैसी बेसिक समस्याआें से ही जूझ रहा है। शुक्रवार को 6.68 फीसदी दर पर खड़ी महंगाई की खबर पर कमलनाथ और चिदंबरम की प्रतिक्रियाएं ऐसे ही यथार्थबोध का हिस्सा हैं। कमलनाथ ने जहां स्टील, सीमेंट और मैगनीज समेत 40 वस्तुआें पर एक्सपोर्ट रियायतें वापस ले लीं, वहीं चिदंबरम ने फिस्कल बदलावों का संकेत देते हुए कहा कि वक्त आ गया है कि देश महंगाई को नाथने के लिए विकास की कुर्बानी दे। ब्याज दरों की बुलंदी को और कुछ महीनों तक झेल ले। लगभग ऐसे ही स्वर बाजार मूल्यों पर गठित मंत्रिमंडलीय समिति से उभर रहे हैं। हमारा सवाल लेकिन यह है कि आम आदमी की जिन्दगी से सीधे जुड़े इस सवाल पर सरकार की अप्रोच आग लगने पर कुआं खोदने जैसी ही क्यों बनी हुई है। दमकल उपायों की एक ही जानी-पहचानी कहानी क्यों बार-बार दोहराई जाती है? वही थोक मूल्य सूचकांक की ताजा विज्ञप्ति, वही चुनावी रणनीतिकारों की पेशानी पर बल पड़ना, वही रीपो-रिवर्स रीपो के रास्ते ब्याज दर में तेजी और वही इंपोर्ट-एक्सपोर्ट दरों में ताबड़तोड़ परिवर्तन! ऐसा तो नहीं कि जड़ का इलाज किए बिना पत्तों पर ही वक्त बर्बाद हो रहा हो? अगर सरकार मानती है कि देश आयातित महंगाई का शिकार है और पाम आयल, चावल और कच्चा तेल ही हमारे असली दुश्मन हैं तो हमारा सारा ध्यान ‘सप्लाई साइड वाली रियल इकॉनमी’ पर ही क्यों नहीं केंद्रित होता? क्यों नहीं, गेहूं, चावल, तेल, सीमेंट और स्टील की उपलब्धता सुनिश्चित करने की एक बारहमासी नीति तय होती? चावल जैसी चीज के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगाने की बात तब ही क्यों याद आती है जब महंगाई साढ़े 13 माह का रिकॉर्ड तोड़ देती है? यूं ये तमाम सवाल माकपा की कोयम्बटूर बैठक से लेकर दिल्ली विधानसभा तक में उभरे हैं, लेकिन महंगाई के शोकगीत का, राजनीति से परे एक इंसानी पहलू भी है। रिटेल बाजार में दो महीने में 62 रुपए प्रति लीटर से 0 रुपये प्रति लीटर तक की छलांग लगाने वाला सोयाबीन तेल उसी पहलू का नमूना है। देखना बस यह है कि थैलाभर पैसों के बदले मुट्ठीभर शक्कर आने की ड्रामाई अतिश्योक्ित सच होने में कितना वक्त और बचा है और कब तक एक ठोस समस्या के पिलपिले समाधान आजमाए जाते हैं।

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