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अफीम सौदागरों का बिहार सॉफ्ट टारगेट

अफीम! वह करामाती पौधा जिसकी कोख से दुनिया का सबसे तेज नशा ‘हेरोइन’ जन्म लेता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक किलो ‘प्योर’ यानी ‘अनकट’ हेरोइन की कीमत एक करोड़ रुपए होती है। इसके सौदागरों के लिए बिहार नया ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन गया है। हनुमानगढ़ी-गंगानगर (राजस्थान) और श्रीनगर की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगातार बढ़ती चौकसी के चलते ‘आपरेटरों’ के लिए अब पाकिस्तान सीमा से देश के अन्दर ‘माल’ ला पाना काफी मुश्किल हो गया है। ऐसे में उनकी नजर ‘लोकल माल’ यानी राज्य में ही पैदा की गई अफीम पर टिक गई है।ड्ढr ड्ढr हाल के दिनों मंे जिस तरह से यहां अफीम और उसके उत्पादों के बड़े कंसाइनमेंट पकड़े गए हैं उससे यह बात साफ हो गई है कि नशे के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए बिहार प्रमुख चरागाह के रूप में उभर रहा है। नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा इस काम मंे मुफीद साबित हो रही है। कस्टम सूत्रों का दावा है कि पिछले कुछ माह में यहां लगभग 100 करोड़ रुपए का माल पकड़ा जा चुका है। तस्करों का मनोबल बढ़ाने में केन्द्रीय एजेंसी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के लखनऊ और कोलकाता के जोनल दफ्तरों की निष्क्रियताका भी उतना ही हाथ है। नारकोटिक्स मामलों में बिहार लखनऊ और झारखंड कोलकाता ब्यूरो से कंट्रोल होता है। नशे के सौदागरों के हौसले कितने बुलंद हैं इसका अंदाजा इसीसे लगता है कि कभी सिर्फ दुर्गम नक्सल प्रभावित जंगलों, पहाड़ों और दियर-तराई के क्षेत्रों में होने वाली इसकी खेती इन दिनों पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश से सटे यहां के कई जिलों में पसर गई है।ड्ढr ड्ढr उत्पाद और मद्य निषेध विभाग से मिली जानकारी के अनुसार बिहार के लगभग दर्जन भर जिलों के 250 से 300 एकड़ में इसकी खेती हो रही है। एक अधिकारी के मुताबिक तस्करों ने बिहार से देश के अन्य हिस्सों में ‘माल की सेफ सप्लाई’ के लिए ‘रूट’ भी तलाश ली है। नेशनल परमिट वाले राजस्थान-पंजाब के ट्रकों के अफीम एडिक्ट ड्राइवर बेहतरीन ‘कैरियर’ साबित हो रहे हैं! तरन्नुम में ले जाने वाली अफीम की छोटी सी ‘अंटी’ की खातिर ये ड्राइवर ‘माल’ की पांच-दस किलो की खेप ट्रक के सामान के बीच छुपाकर आसानी से गंतव्य तक पहुंचा देते हैं। कोई शक-सुबहा नहीं और माल ठिकाने पर डिलीवर! वहां से प्रोसेस कर इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचा दिया जाता है। बिहार के जिन दुरूह इलाकों में अवैध रूप से इसकी खेती होती है, वहां पुलिस भी काफी मुश्किल से पहुंच पाती है लेकिन नशे के कारोबारियों के लोग धड़ल्ले से पहुंच रहे हैं। गांवों के किसान इनके दलालों और आपरेटरों को ही असली मालिक समझते हैं जबकि ‘किंगपिन’ पर्दे के पीछे ही रहते हैं। पुलिस की दबिश में पकड़े जाते हैं-गरीब भोले-भाले किसान! उधर ‘अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी’ आराम से अपना धंधा दूसरों के मार्फत चलाते रहते हैं। ड्ढr अफीम का अर्थशास्त्र!ड्ढr पटना (हि.ब्यू.)। आज की तारीख में अफीम की खेती किसी ‘गोल्ड माइन’ से कम नहीं है। यह वो पौधा है जिसके फूल और फल की तो बात ही अलग है, एक-एक तिनका यहां तक कि डंठल और जड़ तक हाथों-हाथ बिक जाती है। वह भी बेहतरीन कीमत पर। जानकारी के मुताबिक बिहार के विभिन्न जिलों में सक्रिय ‘आपरेटर’ अफीम उगाने के लिए किसानों से उनके खेत किराए पर ले लेते हैं। फसल उपजने पर इसके फूलों में बारीक ब्लेड से बड़ी सफाई से चीरे लगाए जाते हैं। इससे निकलने वाले दूध जैसा तरल पदार्थ जमा किया जाता है। यही अफीम बनता है। एक कट्ठे में औसतन 1300 पौधे लगाए जाते हैं और एक पौधे से औसतन पांच ग्राम अफीम निकलता है। इस तरह प्रति कट्ठे 6.5 से सात किलो।ड्ढr ड्ढr किसान को ‘आपरेटर’ से प्रति किलो अफीम के लिए 35,000 रुपए मिलते हैं। इसमें से आधा हिस्सा यानी 17,500 रुपए नक्सलियों को बतौर लेवी चला जाता है। किसान फिर भी बम-बम रहते हैं। उनके लिए यह कोई घाटे का सौदा नहीं होता। जिस जमीन पर हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी साल भर में वे 500 रुपए प्रति कठ्ठा नहीं कमा पाते उसके लिए उनको हजारों रुपए मिल जाते हैं। तुर्रा यह कि पल्ले से दमड़ी भी खर्च नहीं करनी पड़ती। खाद-बीज सब ‘आपरेटर’ का। किसान को सिर्फ श्रमदान करना होता है। यानी हिंग न फिटकिरी रंग चोखा! खेत के किराए के रूप में उनको 2500 से 3000 रुपए पहले ही मिल चुके होते हैं। 35,000 रुपए की यह अफीम 60,000 मंे दलाल के हाथों बेच दी जाती है। दलाल इसे आगे अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक लाख रुपए किलो बेच देता है। लगभग तीन किलो अफीम को प्रोसेस कर एक किलो ‘ब्राउन शुगर’ बनाया जाता है जिसकी कीमत बढ़कर 10 लाख रुपए तक होती है। इससे ही आधुनिकतम लैब में ‘हेरोइन’ बनाया जाता है जिसकी कीमत एक करोड़ रुपए प्रति किलो हो जाती है। अब आइए इसके फल पर जिसे पोस्तादाना कहा जाता है। खुदरा बाजार में इसकी कीमत लगभग 500 रुपए किलो है। फल के छिल्के को कूटकर तैयार की गई भूसी भी बाजार मंे बिकती है। इसे भिगोकर इसके पानी का इस्तेमाल चाय और कत्थे में किया जाता है। कुछ दिनों के इस्तेमाल के बाद व्यक्ित इसका एडिक्ट हो जाता है और वह बार-बार उसी दुकान पर जाने लगता है। इसका अंतिम उत्पाद होता है-‘चंडू’-जिसे डंठल और टहनियों को कूटकर बनाया जाता है। इसे सुलगाकर लोग इसके धुएं से नशा करते हैं और गप हांकते हैं जो चंडूखाने की गप के रूप में प्रसिद्ध है।

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