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छोटे शहर खींच रहे बड़ी कंपनियों को

अब छोटे शहरों के बंटी-बबली को झोला उठाकर बड़े शहरों का रुख करने की जरूरत नहीं, खुद कंपनियां उनके शहरों में आ रही हैं। महेन्द्र सिंह धोनी के टीम इंडिया में आने, छाने और कप्तान बनकर जिताने ने ऐसा करिश्मा किया है कि सारे देश में परिवर्तन की लहर देखने में आ रही है। बाजार और बाजारियों दोनों का रुख छोटे शहरों की आेर बढ़ चला है। इसके बाद प्रवीण कुमार, इशांत शर्मा, रोहित शर्मा और श्रीशंत ने नामी-गिरामी कंपनियों को छोटे शहरों की आेर रुख करने को मजबूर कर दिया है। अब ये कंपनियां छोटे शहरों में पनप रहे होनहारों को खुद चलकर चुनने लगी हैं। उन्हें लगने लगा है कि भारत का भविष्य छोटे शहरों में ही है, यदि इन पर निवेश किया जाए तो आगे चलकर काफी फायदे का सौदा साबित होगा। हाल ही में चंडीगढ़, भोपाल, इंदौर आदि कई शहरों में कुछ क्लबों और स्कूलों को गोद लिया गया है। रियल एस्टेट कंपनी यथा डीएलएफ, आेमेक्स, पाश्र्वनाथ जैसी बड़ी कंपनियां तो पहले से ही छोटे शहरों में कदम बढ़ा चुकी हैं, लेकिन अब कार कंपनी, मारुति और टाटा मोटर्स, फार्मेसी कंपनी रैनबेक्सी की सहायक कंपनी रेलिगेयर, एटलस फार्मास्यूटिकल्स, डाबर इंडिया, आईटी कंपनी जैनपैक्ट जैसे कई कंपनियां छोटे शहरों में ही नहीं गांवों की आेर रुख कर रही है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि देश के शहरी क्षेत्र में जो भी विकास हो रहा है, वह महानगरों तक केंद्रित है। पर अब लोग मानते हैं कि महानगरों से आगे भी छोटे शहरों की अपनी अलग कहानी है। 100 शहरों में 74,000 अरब रुपए की खपत के बाजार में महानगरों का योगदान सिर्फ 30 फीसदी ही है, जबकि छोटे शहरों का योगदान 70 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। अर्नेस्ट एंड यंग ने हाल ही में ‘द धोनी इफेक्ट : राइज ऑफ स्मॉल टाउन इंडिया’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। संस्था के प्रमुख सदस्य अशोक राजपाल ने कहा कि आज बाजार की ग्रोथ ही छोटे शहरों में मौजूद है।

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