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महंगाई पर नकेल

सरपट दौड़ रही महंगाई को थामने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उनसे किसी क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा नहीं जानी चाहिए। कच्चे खाद्य तेलों पर आयात शुल्क समाप्त करने, रिफाइंड पर कम करने और गैर बासमती चावल व दालों के निर्यात पर रोक लगाने जैसे प्रशासनिक कदमों से खाद्यान्न, दालों व सब्जियों की सप्ताह दर सप्ताह बढ़ती कीमतों पर शायद ही अंकुश लग पाए। मुद्रास्फीति की दर सात प्रतिशत के पास पहुंचने से पहले यदि सरकार ऐसी कसरत कर लेती तो अब तक बाजार पर उसका असर दिखाई पड़ने लगता। खतरे की घंटी सुनाई देने पर ही जागना बुद्धिमानी नहीं मानी जा सकती। दुनिया के बाजार में खाद्य वस्तुआें की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी हैं। पिछले वर्ष अप्रैल से दिसम्बर के बीच विश्व बाजार में खाद्यान्न मूल्यों में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि इस दौरान भारत में केवल 5.1 प्रतिशत इजाफा हुआ। लेकिन आज विपक्षी दल ही नहीं सरकार की सहयोगी वाम पार्टियां भी बढ़ती महंगाई के खिलाफ जनान्दोलन छेड़ने की धमकी दे रही हैं। खुली अर्थव्यवस्था की राह पर चलने के बाद देश में गरीब व अमीर की आय असमान बढ़ी है। देश की 75 प्रतिशत आबादी का प्रतिदिन का खर्चा दो डालर प्रति व्यक्ित से भी कम है, जो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक गरीबी की रेखा से नीचे कहलाएगा। जब आमदनी कम हो, खर्च करने की क्षमता कमजोर हो तब महंगाई में मामूली बढ़ोतरी भी बहुत अखरती है। आज यही हो रहा है। खाने-पीने की वस्तुआें की आपूर्ति बढ़ाए बिना चालू महंगाई को रोकना कठिन है। कुछ वषरे से गेहूँ, चावल, दाल आदि का उत्पादन लगभग स्थिर है, पर मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। आज देश में प्रति व्यक्ित खाद्यान्न खपत की स्तर 70 के दशक पर पहुंच चुका है। कृषि विशेषज्ञों की मानें तो अभी गेहूँ, चावल व अन्य अनाजों का उत्पादन पचास प्रतिशत तक बढ़ाए जाने की गुंजाइश है। दूसरी हरित क्रांति का नारा तो जोर-शोर से लगाया जा रहा है, किन्तु अमल के मोर्चे पर इच्छाशक्ित का अभाव स्पष्ट है। सिर्फ़ मौद्रिक व राजकोषीय उपायों के सहारे वर्तमान महंगाई से दीर्घ काल तक लड़ना मुश्किल है। वर्तमान महंगाई की जड़ कहीं गहरी है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करने, आवश्यक वस्तु अधिनियम को कड़ाई से लागू करने, खाद्य पदाथरे के वायदा कारोबार पर रोक लगाने व जमाखोरों को जेल में डालने का काम तो तत्काल किया जा सकता है। अनुमान है कि दुनिया के बाजार में अगले दस बरस तक खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि जारी रहेगी। इस कटु सत्य को स्वीकार करने की हिम्मत न तो भारत सरकार में फिलहाल दिख रही है और न ही बहुसंख्यक गरीब जनता में। जनता का पेट भरने की जिम्मेदारी तो सरकार को उठानी ही पड़ेगी। ं

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