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बिखरी हुई खबरों के जुड़ते सूत्र

पिछले दिनों कुछ छिटपुट खबरें सुर्खियांे में छाती रही हैं। राजधानी में पुलिस मुठभेड़ों के महानायक एक अधिकारी की हत्या पड़ोसी गुडगांव में हो गई। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के नाम छठे वेतन आयोग की छोटी सी लॉटरी खुल गई। नशे में धुत्त कार चालकों ने सड़क पर काम कर रहे मजदूरों को और पैदल चलने वालों को बेरहमी से कुचल दिया। बिग बी ने फिर मुंह खोला और किसानों को दान या उपहार में दी उन्हीं की विवादास्पद जमीन वापस मांगी। राहुल बाबा ने एक रात दलित परिवार के साथ बिताने के बाद मायावती पर दलित उपेक्षा का आरोप लगा कर हिन्दी पट्टी में चुनाव की रणभेदी में फूंक मारी। सवर्ोच्च न्यायालय ने गुजरात दंगों की फिर से जांच का हुक्म सुनाया तो महाराष्ट्र की विधानसभा ने राज्य के चुनाव अधिकारी को हिरासत में भेज दिया, अवमानना के आरोप में। योजना आयोग के एक सदस्य ने यह चेतावनी दी कि भारत में खाद्यान्नों का उत्पादन तेजी से घट रहा है। हकीकत यह है कि देश फिर से अभाव और भुखमरी की कगार पर खड़ा है। उत्तर प्रदेश में राजनैतिक समीकरण राष्ट्रहित में नहीं, मौकापरस्त ढंग से बदल रहे हैं, अमर सिंह की मध्यस्थता से कांग्रेस और सपा के बीच संबंध सुधरने के आसार नार आ रहे हैं। वामपंथी साम्यवादी दलों के सदस्य भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं यह दावा करते हुए कि भारत अमेरिका परमाणविक समझौते पर अंतिम फैसला जून तक सुनाया जाएगा तथा कांग्रेस और भाजपा से इतर तीसरे मोर्चे की तलाश उन्होंने अभी छोड़ी नहीं है। इन सब खबरों को पढ़ते-देखते यह लग सकता है कि चिंता की कोई बात नहीं, सभी कुछ तो बदस्तूर चल रहा है। अखबारों का रोज छपना और टेलिविजन के चैनलों का आठों पहर अलापना उनकी मजबूरी है। हमें अपनी जिन्दगी के बुनियादी सरोकारों के बारे में गाफिल नहीं रहना चाहिए। ऊपर जिन तमाम बातों को सतही तौर पर छुआ गया है, वास्तव में वापस में गुंथी हुई है और एक दूसरे के कारक भी हैं। सबसे पहले एसीपी राजबीर सिंह के कत्ल का मामला लें। इस वारदात के पहले भी इस पुलिस अफसर पर अकूत संपत्ति नाजायज ढंग से अर्जित करने के आरोप लगते रहे हैं। इसी बिरादरी के फर्जी मुठभेड़ों में माहिर मुंबई पुलिस के कई और अधिकारी भी इसी तरह विवादास्पद और आरोपों के घेरे में हैं। इस बात को कतई नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि रक्षक को भक्षक बनाने वाले हालात हमारे देश की कानून और दंड व्यवस्था का दर्दनाक सच है। जो न्यायपालिका और विधायिका अपनी तथाकथित अवमानना से बौखला कर संवैधानिक अधिकारियों को जेल पठाती है, वह इस बात के प्रति बिलकुल निशचिंत नजर आती है कि अपराधी को दंडित कराने में न्याय प्रणाली कितनी असमर्थ है और असामाजिक आपराधिक तत्वों से छुटकारा पाने के लिए पुलिस अधिकारियों को खुद गैरकानूनी तरीके अपनाने के लिए सरकारी तौर पर प्रोत्साहित किया जाता है। अपने बालात्कारी पुत्र को फरार कराने में उड़ीसा के पुलिस महानिदेशक की भूमिका हो अथवा पत्रकार शिवानी हत्याकांड में लगभग एक दशक बाद हरियाणा के पुलिस महानिदेशक का जुर्म साबित होना, इसी दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति का प्रमाण है। जो लोग पैसे के नशे में मगरूर गरीबों को अपनी हत्यारी कारों से कुचलते हैं, वह भली भांति जानते हैं कि उनका कोई भी बालबांका नहीं कर सकता। इसे मात्र संयोग न समझा जाए कि एक से अधिक ऐसी घटना को अंजाम देने वाले चालक बीएमडब्लू् कार में सवार थे- संजीव नंदा हो या पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री के पोते। कुख्यात रोमेश शर्मा ने भले ही अपनी बीएमडब्लू से किसी को कुचला न हो उनकी पसंदीदा कार भी यही थी और जिस गोल्फ खिलाड़ी महिला ने एक और पैदल राहगीर को अस्पताल पहुंचाया है, वह भी इसी महंगी मोटर गाड़ी को चला रही थी। जो लोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़ाये जाने से परेशान हैं, वह इस बात को जान-बूझ कर भूल रहे हैं कि वास्तव में यह रकम खर्च करने से सरकार की कमर टूटने वाली नहीं, अगर सरकार की कमाई और खर्च का वास्तव में हिसाब-किताब ठीक करना है तो नाजायज ढंग से रईस बने, असामाजिक तत्वों की संपत्ति की राष्ट्रहित में जांच-पड़ताल जरूरी है। उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के युग में अपने हिन्दुस्तान में, कमाई में (नाजायज ही सही) कोई बुराई नहीं। और गरीबी एकमात्र पाप, छूत की बीमारी है जिससे बचने की जरूरत है। अगर गरीबी नहीं हटाई जा सकती तो गरीबों भुखमरों का ही उन्मूलन करने का अभियान चलाया जाना चाहिए। अगर छोटे किसान खुदकुशी कर अपनी संख्या तेजी से घटाने में असफल रहते हैं, तो फिर रईस अपनी कारें तेज रफ्तार से दौड़ाते, महानगरों की झोपड़पट्टियों में रहने वाले नागरिकों की तादाद कम करने में हाथ बंटा सकते हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं कि नाजायज कमाई के लिए पुलिस अधिकारियों, आयकर या सीमा शुल्क विभाग के अफसरों को पटाना अपने साथ रखना परमावश्यक है। इसके बाद वाली सोपान पर बैठे हैं राजनेता, जिनकी छत्रछाया और वरदहस्त के बिना कोई भी कार्यकुशल समझदार और भ्रष्ट अधिकारी कमाई-धमाई वाली कुर्सी पर बैठा नहीं रह सकता। वक्त से पहले बारंबार पदोन्नत होने वाले राजबीर सिंह हो या हरियाणा के महानिदेशक शर्मा दोनों ही पहुंच वाले अफसर थे। सजा सुनाने वाले न्यायालय के प्रति पूरे सम्मान के साथ हम यह शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं कि आरोपी को सजा सुनाते वक्त उसे राष्ट्रीय संपदा करार देना जरूरी समझा गया। यदि तक्षक नाग ही जनहित रक्षक है तो ऐसी राष्ट्रीय संपदा से दरिद्रता भली। यदि चुनाव अधिकारियों को विधायिका जेल भिजवा सकती है तो यह फिर सोच पाना कठिन है कि चुनाव कैसे निष्पक्ष और निर्भय करवाए जा सकते हैं। जो विद्वान विदेश नीति के विश्लेषण में व्यस्त हैं, उन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं कि राहुल क्यूं बाजू फुला रहे हैं और सीना चौड़ा करने लगे हैं या क्यों वामपंथी फिर से ‘सांप्रदायिक तत्वों’ के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा खोलने की तैयारी कर रहे हैं और कांग्रेस से अपने को अलग-थलग दिखलाने के लिए छटपटा रहे हैं। इन छोटी-बड़ी खबरों के बीच भू-माफिया की करतूतों हथियारों के सौदागरों की हरकतों और अनाज के सड़ते-सिकुड़ते भंडार की चिंता कम ही लोगों को है। स्थिति कभी भी विस्फोटक रूप से भयानक बन सकती है। उस वक्त न महानायक वीरू का तिहरा शतक हमारी जान बचा सकता है और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के फैशन डिजाइनरों के लहंगा-चोली, शेरवानी या अचकन काम लगेंगे।ड्ढr लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं

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