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बोरवेल में गिरी नीतियां

रीब 27 घंटे की जद्दोजहद के बाद वंदना ने जिंदगी की जंग जीत ली। उत्तर प्रदेश में आगरा के सैया थाने के तहरा गांव में 45 फुट गहरे बोरिंग के गड्ढे में गिरी थी ढाई साल की बच्ची वंदना। सेना के अथक और सूझबूझ भरे प्रयास, ने बच्ची को जिन्दा बाहर निकाल लिया। महीने भर पहले तहरा गांव के बंगाली कुशवाहा के घर के सामने खेत पर 180 फुट गहरी बोरिंग कराई गई थी। पानी नहीं निकलने पर गे को बोरे से ढंक दिया गया था। क्या प्रशासन इतना भी सुनिश्चित नहीं कर सकता कि इस तरह गड्ढे खुदे न रहें, चाहे वे बोरवेल के लिए खोदे जा रहे हों या किसी अन्य वजह से। गडढें खुले न रहें प्रशासन के अधिकारी यह एहतियात बरतने के बजाय मीडिया आयोजित ‘शो’ में शामिल हो जाते हैं। प्रिंस को बचाने के लिए मजमा जुटा, पर गड्ढा खुला क्यों रह गया था, इसकी छानबीन किसी ने नहीं की - न लोगों ने, न प्रशासन ने, न पंचायत व पालिका ने और न ही मीडिया ने। क्या प्रिंस या वंदना का गड्ढे में गिर जाना महज एक हादसा था? क्या ठेकेदार या जमीन के मालिक या प्रबंधक की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि गड्ढे को तुरन्त ढंक दिया जाए? जो बच्चे ऐसे हादसों के शिकार होते हैं, वे गरीबों व मजदूरों के होते हैं। मां-बाप काम पर लगे होते हैं और बच्चे भाग्यभरोसे। खेलते-खेलते बच्चे लापरवाही के इन गड्ढों में गिर पड़ते हैं। यादातर तो दम तोड़ देते हैं। कुछ किस्मत वाले जिन पर मीडिया की नजर पड़ती है, सेना प्रशासन सक्रिय होते हैं, वे बाहर निकाल लिए जाते हैं। कई तो बाहर निकल आने पर भी बच नहीं पाते। मीडिया पर सब कुछ लाईव होता है, इसीलिए उसकी न्यूज वैल्यू होती है। बच्चा कहां अटका है। बचाव में क्या कुछ किया जा रहा है। नामी-गिरामी लोग आ-जा रहे हैं। दुखी-परेशान-चिंतित मां पूजा पाठ कर रहीं हैं। तुरन्त दुआओं में सैकड़ों हाथ उठ जाते हैं। मंदिरों में पूजा, मस्जिदों में नमाज शुरू हो जाते हैं। टीवी के पर्दे पर मैसेज आने लगते हैं। ऐसा लगता है, जैसे सारा देश उस बच्चे की जिंदगी की जंग में शामिल हो। मीडिया चाहे तो बच्चों के मानवधिकारों के सवाल पर एक पूरा चौबीस घंटे का चैनल रन कर सकता है। पर मीडिया देख कर भी अनदेखी करता है। गड्ढे में शॉट सर्किट कैमरा डालकर बच्चे को देख पाता है, हमारा मीडिया पर सड़कों पर ढाबों के रूप में बनें गड्ढों में गिरते बच्चों को नहीं देख पाता। शहरों में खुले मैन होल्स में गिर कर भी जान गंवाते हैं बच्चे। इन पर नहीं जाती किसी की नार। जयपुर में सूरज की गड्ढे से निकालते वक्त एक मजदूर क्रेन के बीच आकर गम्भीर रूप से घायल हो गया था। काम रोक दिया गया था। काफी समझाने-बुझाने के बाद काम फिर से शुरू हुआ था पर सूरज को बचाया नहीं जा सका था। उस मजदूर का क्या हुआ, किसी को पता नहीं। यह हादसा 5 जुलाई, 2007 को हुआ था। 4 अगस्त, 2007 को छह साल के कार्तिक का शव निकाला गया। कर्नाटक के बोटल गुड्स गांव व पामुर मंडल के दक्षिणी जिला प्रशासन की घटना थी। जिला प्रशासन ने 20,000 रुपए, एक पक्का मकान और दो एकड़ का प्लॉट देने की घोषणा की थी। पता नहीं मिला कि नहीं। किसी खबरिया चैनल ने यह जानकारी नहीं दी। प्रिंस कि घटना के बाद ऐसी 6-7 घटनाएं हुई। सभी जीते हुए या मरकर अचानक ‘खास’ हो गए। अब कई लोग कह रहे हैं कि पैसे व नाम पाने के लिए लोग जान-बुझकर अपने बच्चों को बोरवेल में ढकेल देते हैं। लापरवाही का यही आलम शहरों में भी है। सीवर के खुले मैनहोल, टेलीफोन, बिजली पानी आदि की लाइनें ठीक करने के मकसद से खोदे गए गड्ढों में जब-तब लोगों के गिर कर घायल हो जाने या दम तोड़ देने की घटनाएं होती रहती हैं। बारिश के दिनों में तो मैनहोल के ढक्क न उठा देते है। लोगों को खुले मैनहोल का पता नहीं चल पाता और वे उसमें गिर कर बह जाते हैं। पिछली बरसात दिल्ली के विभिन्न इलाकों में खुले सीवर में तीन बच्चे बह गए। रात के अंधेरे में बच्चे ही नहीं, बड़े भी गिर जाते हैं। सिर्फ कैमरा होने पर ही नहीं, बिना कैमरे के भी हमें संजिदा होना होगा।ड्ढr लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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