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सफेद कोट में भगवान

एम्स के इमरजेन्सी वार्ड में मेरे सामने नौ नंबर बेड पर पड़ी वह महिला बदहवासी में चिल्लाए जा रही थी। अचानक उसने ऑक्सीजन मास्क उतार कर फेंक दिया। देखते ही देखते वह मरणासन्न हालत में पहुंच गई। न तो वह हिलडुल रही थी और न ही उसके मुंह से कोई शब्द निकल रहा था। पलक भर में इमरजेन्सी वार्ड में डय़ूटी पर तैनात कई डॉक्टर इकट्ठे हो गए। एकजुट कर दी उसे बचाने की कोशिशें। कड़े बॉडी मसाज से लेकर इजेंक्शन तक हर उपाय किया। मेहनत रंग लाई और उन्होंने उसे बचा लिया। उनके लिए अक्सर होती होंगी ऐसी घटनाएं। इसलिए अपनी इस उपलब्धि पर बहुत एक्साइटेड नहीं दिखे वे। सबके चेहर पर एक कीमती जान बचाने में कामयाब रहने की तसल्ली जरूर थी। महिला न बचती तो मुमकिन है उन पर ‘लापरवाही और मरीज की उपेक्षा’ का इल्जाम लगा दिया जाता। डॉक्टरों को कठघरे में खड़ा करने का एक और मुद्दा बन जाता, भले ही गलती खुद मरीज की थी। आये दिन मौत के द्वार-कगार पर पहुंचे कितने ही मरीज ऐसे डॉक्टरों की कर्तव्यनिष्ठा की बदौलत जीवनदान पाते रहते हैं। बीमारी के मारे कितने ही बुझते चिराग उनकी अथक लगन से दोबारा रोशन हो जाते हैं। हार्ट अटैक, ब्रेन हैमरेज आदि से अचेत, एक्यूट ब्रेंथलेसनैस के शिकार या एक्सीडेंट के कारण खून से लथपथ हालत में स्ट्रेचर पर डाल कर इमरजेन्सी वार्ड में लाए गए सैंकड़ों मरीज डॉक्टरों नसर्ों के हाथों चंगे होकर अपने दो पांवों के सहारे घर वापस लौटते हैं और पुन: जुट जाते हैं जिंदगी के रुटीन में। कइयों को वे डीप कोमा से बाहर निकाल लाते हैं। पर अफसोस, उनकी इस कर्तव्यनिष्ठा व उपलब्धि का यशोगान किसी मीडिया या मंच में नहीं होता। मौत की शैया पर पड़े किसी मरीज का जीवन बचाने तथा उसके परिजनों के चेहरे पर मुस्कान लाने की उनकी सफलता की गाथा की कहीं कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं होती। क्या इसलिए कि यह तो उनकी डय़ूटी है? उसका यशोगान कैसा? दूसरी आेर उनकी ‘लापरवाही’ और ‘मरीज की उपेक्षा’ के चर्चे खूब होते हैं। किसी मरीज की मौत पर मामले की तह में जाए बिना उनका मीडिया ट्रायल भी अक्सर होता है। जीवन संरक्षण में एक डॉक्टर का महत्व व मायने क्या होते हैं? कृतज्ञ लोग क्यों उन्हें ‘सफेद कोट में भगवान’ कहते हैं- इस बात का मर्म किसी भंयकर बीमारी के ट्रामा से गुजर चुका और इलाज के बाद सामान्य जिंदगी जी रहा शख्स ही जानता है। विदेश में बसे मेरे संबंधी के एक पांव में गैंगरीन इतनी फेल गई थी कि अगर तुरंत ऑपरेशन न होता तो पांव काटना पड़ता। कुशल सर्जन ने कई घंटे ऑपरेशन करके गैंगरीन निकाल दी और उनका पांव बच गया। तब से लेकर वे हर साल क्रिसमस और नए साल के मौके पर उस सर्जन के घर फूलों के गुलदस्ते के साथ अपनी कृतज्ञता जाहिर करने जाते हैं। जरा सोचें, इनसे अलग क्या होगा भगवान?ड्ढr

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