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खामोश कृषि क्रांति में कूदे डाक्टर-इंजीनियर

ैमूर में चल रही खामोश कृषि क्रांति में अब डाक्टर व इंजीनियर भी कूद पड़े हैं। रामगढ़ में नोनार के डा. विन्देश्वरी सिंह व ठकुरा गांव में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर आए युवक शैलेंद्र सिंह कुशवाहा औषधीय खेती में जुटे हैं। इन दोनों ने औषधीय पौधा मेन्था (पिपरमेंट) की खेती की है, तो डाक्टरों व इंजीनियरों के गांव डरवन के किसान जयप्रकाश सिंह उर्फ जेपी ने 20 एकड़ में पिपरमेंट व चार एकड़ में सूर्यमुखी की खेती कर समृ ितो ही रहे हैं, खाद्य तेल का विकल्प भी तलाश लिया है।ड्ढr ड्ढr डा. बिन्देश्वरी ने जहां पांच एकड़ में मेन्था की खेती की है, वहीं इंजीनियर शैलेंद्र दो साल से तीन एकड़ में न केवल मेन्था की खेती की है, बल्कि अपने फार्म में बाकायदा मेंथा आयल-प्रोसेसिंग -प्लांट भी स्थापित कर किसानों को नई राह दिखाई है। किसान जेपी सिंह ने बताया कि मात्र तीन माह में यह फसल तैयार हो जाएगी, तब उनका शु मुनाफा 40 हजार प्रति एकड़ की दर से आठ लाख रुपए होगा। दोनों ने पूरे विश्वास से कहा कि औषधीय पौधों की खेती डाक्टरी व इंजीनियर के पेशे से कम नहीं। रामगढ़ के किसानों के लिए मिसाल बने तीनों लोगांे को इस बात का अफसोस है कि उपज के बाद तैयार माल के लिए बाजार का अभाव है। इसके लिए उन्हें यूपी के बाराबंकी शहर तक का सफर करना पड़ता है।ड्ढr ड्ढr आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के शैलेंद्र बताते हैं कि पिता मैनेजर सिंह कुशवाहा एवं भाई सत्येंद्र के साथ खेत में मेहनत तो करते हैं, लेकिन बैंकों से कोई सहयोग नहीं मिला। फिर भी 45 हजार खर्च कर प्लांट बैठाया। बकौल सत्येंद्र मेन्था को काटकर थोड़ा सुखाने के बाद प्लांट में डालकर गर्म करने पर तेल निकलने लगता है। अब शैलेंद्र ने यहीं पर उत्पादित फसल की खरीद बिक्री की योजना बनाई है। किसानों द्वारा की गई औषधीय पौधों की खेती के तौर तरीकों को जानने-समझने के लिए क्षेत्र के किसान जुट रहे हैं।

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