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नए क्षेत्र की नौकरियां घटा रही हैं यौन क्षमता

ॅरियर और वेतन के लिहाज से आकर्षक माने जाने वाले बीपीआे, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे नए क्षेत्र स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक साबित हो रहे है। आज के लड़के-लड़कियों के लिए बीपीआे, आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे नौकरी के नए क्षेत्र आकर्षण के केन्द्र बने हुए हैं, लेकिन अब इन चमकते उद्योगों के काले पहलू भी सामने आने लगे है। कार्य के लंबे घंटे, लंबी अवधि तक चलने वाली रात की शिफ्ट, असंभव से प्रतीत होते लक्ष्य, अपनी पहचान स्थापित करने की कड़ी प्रतिस्पर्धा और नौकरी पर हमेशा मंडराते असुरक्षा के बादल ये सभी पहलू यहां काम करने वालों को दिल के दौरे, हृदय रोग पाचन की गड़बड़ियां, मोटापा, डिप्रेशन, तनाव, अनिन्द्रा और जोड़ों में दर्द जैसी शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याआें के शिकार बना रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार बीपीआे उद्योग में 16 लाख युवा कार्यरत हैं। करीब इतने ही लोग आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन उद्योगों में काम करने वाले युवाआें की स्थूल जीवन शैली, काम की लंबी अवधि, तनावपूर्ण कार्यस्थितियां और तीव्र प्रतिस्पर्धा के कारण इनमें कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां पैदा हो रही है। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ पुरुषोत्तम ने बताया कि लंबे समय तक तनाव में रहने अथवा लंबे समय तक विपरीत एवं तनावपूर्ण कार्यस्थितियों में कार्य करने के कारण रक्तचाप बढ़ने हृदय की रक्त नलियों में रक्त के थक्के बनने और दिल के दौरे पड़ने के खतरे बढ़ जाते है। मेट्रो हास्पिटल्स एवं हार्ट इंस्टीटय़ूट के निदेशक पद्मभूषण डॉ पुरुषोत्तम लाल ने कहा कि पिछले कुछ वषरे में पेशेगत कायरे से संबंधित तनाव कार्य के घंटे बढ़ने और गलत रहन-सहन एवं खान-पान, धूम्रपान, फास्ट फूड और व्यायाम नहीं करने जैसे कारणों से युवाआें में दिल के दौरे एवं हृदय रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहे हैं जबकि पहले ये बीमारियां अधिक उम्र में होती थी। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय से कम उम्र के वैसे मरीज अधिक संख्या में आ रहे हैं जो वेतन और अन्य सुविधाएं तो अधिक पा रहे है किन्तु तनावपूर्ण कार्य स्थितियों एवं गलत खान-पान व रहन-सहन के कारण उच्च रक्तचाप एवं दिल की बीमारियों के भी शिकार हो रहे है। इंद्रप्रस्थ अस्पताल के वरिष्ठ मेडिसीन विशेषज्ञ डॉ राकेश कुमार ने बताया कि कार्य के लंबे घंटे काम के तनाव और नाइट शिफ्ट आदि के कारण नींद न आना, मोटापे, पाचन समस्याआें, ब्लड प्रेशर, डायबटीज जैसी बीमारियां हो जाती हैं। इसके अलावा लंबे समय तक कंप्यूटर पर काम करने के कारण जोड़ों में दर्द की समस्या भी हो जाती है। पिछले कुछ समय से उनके पास आने वाले ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ी है। मुंबई के सुप्रसिद्ध यौन रोग विशेषज्ञ प्रकाश कोठारी बताते है कि अधिक पैसे के साथ-साथ तनाव देने वाली नई नौकरियों के कारण आज के युवा यौन क्षमता में कमी तथा अन्य सेक्स समस्याआें से ग्रस्त हो रहे है। उन्होंने कहा कि तनाव एवं शराब यौन क्षमता के सबसे बडे दुश्मन हैं। लंबे कार्य घंटे तथा तनावपूर्ण कार्य के कारण दाम्पत्य एवं पारिवारिक संबंध भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नाइट शिफ्ट में कार्य करने के दबाव एवं तनाव के कारण कई प्रकार की नशीली दवाआें के सेवन की आदत पड़ जाने का भी खतरा होता है। खासकर ज्यादा पैसा कमाने की होड़ में शामिल युवा इनकी तरफ जल्दी आकृष्ट होते हैं। डॉ लाल ने ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला दिया, जिससे यह साबित होता है कि पेशेगत कायरे से जुड़े तनाव का हृदय रोगों एवं मधुमेह के बीच गहरा संबंध है। इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने कार्य के तनाव एवं मेटाबोलिक सिंड्रोम के बीच संबंध का अध्ययन किया। मेटाबोलिक सिंड्रोम उन कारकों में शामिल हैं जो हृदय रोग एवं मधुमेह के खतरे को बढ़ाते हैं। इस अध्ययन से पाया गया कि काम के भारी तनाव को झेलने वाले लोगों में सामान्य लोगों की तुलना में यह सिंड्रोम होने का खतरा दोगुना होता है। लंबे समय तक काम के दौरान तनाव झेलने वाले लोगों के नर्वस सिस्टम (स्नायु तंत्र) पर भी असर पडता है। इस तनाव के कारण शरीर का संतुलन गड़बड़ हो जाता है। डॉ लाल ने बताया कि हालांकि तनाव हमारे जीवन का सामान्य हिस्सा है। लेकिन अगर यह अनियंत्रित हो जाए तो मानसिक और दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर, सीने में दर्द एवं दिल की असामान्य धड़कन जैसी शारीरिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। डॉ लाल के अनुसार जब कोई व्यक्ित तनाव में होता है तो ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। लंबे समय तक तनाव में रहने पर एड्रिनल एवं कोर्टिसोल जैसे हामर्ोनों का स्तर बढ़ जाता है और इससे हृदय रोग के खतरे बढ़ते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चला है कि तनाव के कारण रक्त के थक्के बनने की आशंका बढ़ती जाती है और यह तनाव अन्ततोगत्वा दिल के दौरे का कारण बनता है। हालांकि तनाव और तनावपूर्ण कार्यस्थितियों का सभी लोगों पर एक सामान दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। मनोचिकित्सक डॉ जितेन्द्र नागपाल ने कहा कि पिछले चार महीनों से प्रत्येक सप्ताह काल सेंटरों में काम करने वाले कम से कम दो लोग उनके पास परामर्श के लिए आ रहे हैं। उनके पास आने वालों में ज्यादातर की उम्र 18 से 21 वर्ष के बीच होती है। ये लोग काम से जुडे तनाव, अनियमित नींद, खानपान की गलत आदतों और लंबे समय से चली आ रही थकान के बारे में परामर्श लेने आते हैं। एसोचैम की आेर से किए गए एक अध्ययन के अनुसार भी पिछले कुछ समय के दौरान तनाव एवं मानसिक थकावट का प्रकोप बहुत अधिक बढ़ा है। बीपीआे (काल सेंटरों) आईटी क्षेत्रों एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे क्षेत्रों में कम कर्मचारियों के कारण बहुत अधिक काम और काम के अधिक घंटे, बहुत अधिक जिम्मेदारियों के निभाने का दबाव और प्रतिस्पर्धा को लेकर इन क्षेत्रों में काम करने वाले उच्च एवं मध्यम दर्जे के कर्मचारियों में तनाव एवं उससे जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। जबकि केन्द्र सरकार एवं राय सरकारों से संबंद्ध कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों में इस तरह के तनाव एवं तनाव जनित बीमारियों का प्रकोप बहुत कम है।ं

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