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मुंबई की हकीकत शंघाई का ख्वाब

पिछले पाँच वषरे से भारत में ‘शंघाई’ शब्द सबसे अधिक चर्चित रहा है। इसकी चर्चा सन 2004 में तब शुरू हुई, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक चुनावी भाषण में मुंबई को शंघाई या उससे भी बेहतर शहर बनाने की घोषणा की। चीन का यह महानगर साफ-सुथरा है, वहाँ पर कोई झोपड़पट्टी नहीं है, ऊंची गगनचुम्बी इमारतें हैं और उनका बुनियादी ढाँचा बहुत बढ़िया और आधुनिक है। यद्यपि मुंबई के राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को इसकी शासन-व्यवस्था का कोई खास अंदाजा नहीं है, लेकिन वे चीन के एकदलीय राज्य के संदर्भ में ‘शंघाई’ और ‘शंघाईकरण’ का यही अर्थ समझते हैं कि वहाँ पर लोगों के आंदोलन नहीं होते और उनका बजट असीम होता है। लेकिन यह कैसे संभव हुआ कि शंघाई का तो पूरा कायाकल्प हो गया, जबकि मुंबई को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है? इसमें कुछ हद तक तो एकदलीय राजनीति, तानाशाही व्यवस्था और वित्तीय संसाधनों की भूमिका है। लेकिन सबसे प्रमुख कारण है - चीनी व्यवस्था का राजनीतिक विकेन्द्रीकरण। चीन और भारत की राजनीतिक प्रणालियों में बहुत बड़ा अंतर है। भारत लोकतांत्रिक देश है, जबकि चीन की राजनीतिक प्रणाली ऐसी नहीं है। शंघाई के कायाकल्प में चीन के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण का जो प्रभाव पड़ा है, उससे इंकार नहीं किया जा सकता, जबकि भारत में भी राजनीतिक अधिकारों और संसाधनों को स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण इन प्रयासों में सफलता नहीं मिल पाई है। अस्सी के दशक के आरंभ में दोनों ने ही अपनी शासन-व्यवस्था को विकेन्द्रित करने और वित्तीय संसाधनों के साथ-साथ निर्णय करने का अधिकार स्थानीय स्तर पर देने के प्रयास शुरू किए। 1में चीन के प्रधानमंत्री जाआे झियांग ने आर्थिक विकास के लिए बड़े और मझौले आकार के शहरों के उपयोग की घोषणा की। महानगरों के शासी निगमों को शहरी नीति के मामले में अधिक स्वायत्तता दे दी गई, ताकि वे अधिकाधिक जमीन पट्टे पर दे सकें और निवेश को आकर्षित कर सकें। हालांकि मुंबई की तरह शंघाई में भी बहुत-से पूँजी-बहुल उद्योग थे और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उनका अच्छा-खासा योगदान भी होता था, लेकिन शहर के राजस्व पर केन्द्र सरकार का कड़ा नियंत्रण रहता था। नई नीति से शहर का लगभग 20 गुना भौगोलिक विस्तार भी हुआ और इसका कुल क्षेत्र 282 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 6000 वर्ग किलोमीटर तक हो गया। प्रशासनिक दृष्टि से यह शहर एक नगर निगम से बढ़कर एक महानगर में परिणत हो गया। अस्सी के दशक के आरंभ में भारत पर भी इसी प्रकार अधिकारों और संसाधनों को स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रित करने का दबाव पड़ने लगा था। यह दबाव अलग-अलग विचारधारा वाले दो दलगत समूहों की आेर से आया था। लोकतंत्र-समर्थक सामाजिक कार्यकर्ताआें की आेर से और आर्थिक सुधारों के पक्षधर दलों की आेर से। अस्सी के दशक के मध्य में विकास समर्थक अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताआें ने असमानताआें और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधियों के अभाव के बीच संबंध जोड़ना शुरू कर दिया। इस विचार के समर्थकों ने यह दावा किया कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण से राजनीतिक सहभागिता और संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित किया जा सकेगा। सन 1में ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए 64वाँ और 65वाँ संविधान संशोधन प्रस्तावित किया गया, लेकिन संसद में पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण ये संशोधन पारित न हो सके। 1में नगर निगमों को राजनीतिक दृष्टि से सशक्त बनाने का आंदोलन फिर से पुनर्जीवित हो गया। इस बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सुझाए सुधारों में राजनीतिक विकेन्द्रीकरण को उदारीकरण के लिए पूर्व शर्त के रूप में रखा गया है। 73वें और 74वें संशोधनों से ग्रामीण पंचायतों और नगर निगमों के लिए व्यापक अधिकार देने की व्यवस्था कर दी गई। लेकिन राज्यों के आंतरिक मामलों में दखल देने में संकोच के कारण केन्द्र ने इसे लागू करने पर जोर देने के बजाए राज्यों को सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए मात्र प्रोत्साहित ही किया। महाराष्ट्र सहित अधिकांश राज्यों ने इस प्रक्रिया में स्थानीय निकायों को भागीदार मानने के बजाए अपना प्रतिद्वंद्वी समझा और शहरी विकास का अधिकार अपने पास ही बनाए रखा। मुंबई में कुछ प्रशासनिक सुधार तो लागू किए गए, लेकिन शहरी विकास के नीति-निर्धारण का कार्य राज्य सरकार के पास ही रहा। शंघाई में बड़े स्तर पर और तेजी के साथ विकास परियोजनाएँ तभी चल पाईं, जब अस्सी के दशक में उसे अधिकाधिक स्वायत्तता और संसाधनों को अपनी आवश्यकता के अनुरूप खर्च करने का अधिकार मिला। दूसरी आेर मुंबई के पास नगर निगम के स्तर पर और क्षेत्रीय स्तर पर सीमित अधिकार हैं, जिससे उसकी परियोजनाएँ आगे नहीं बढ़ पाती। यदि हम दोनों शहरों में एक साथ चलने वाली विकास योजनाआें (शंघाई की 2010 विश्व प्रदर्शनी और मुंबई धारावी विकास परियोजना) की तुलना करें तो स्थानीय निकायों पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट हो जाएँगे। सन 2002 में, शंघाई शहर प्राधिकरण ने 2010 विश्व प्रदर्शनी की मेजबानी की पेशकश जीती और तुरंत ही केन्द्रीय शहर में हुआंगपू नदी के किनारे का महत्वपूर्ण भूखंड इसके लिए आबंटित कर दिया। इस भव्य प्रदर्शनी के लिए आवश्यक स्थान खाली कराने के लिए हजारों निवासियों, दर्जनों बड़ी निर्माता कंपनियों, गोदामों और शिपयाडरे को स्थानांतरित किया जाना था। दो वर्ष से भी कम समय में शंघाई शहर प्राधिकरण ने आवश्यक भूखंड को अधिग्रहीत कर लिया है और निवासियों को वैकल्पिक भूमि पर स्थानांतरित भी कर दिया है। मुंबई धारावी विकास परियोजना का कार्य वर्ष 1में शुरू किया गया था, लेकिन वहाँ के निवासियों, उद्योगों और वाणिज्य से जुड़े अन्य कारोबारियों को स्थानांतरित करने के बजाए मुंबई धारावी विकास परियोजना ने उनमें से अधिकांश निवासियों और कारोबार की गतिविधियों को वहीं पर पुनर्वास करने का प्रस्ताव किया। 10 साल से अधिक समय तो अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों में राजनीतिक सामंजस्य स्थापित करने और परियोजना के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाने में ही लग गया। शंघाई ने जितनी सहजता से विश्व प्रदर्शनी जैसी विशाल परियोजना पर काम शुरू किया है, उसके अनेक कारक तत्व हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि अस्सी के दशक के आरंभ में उसे जो अधिकार और संसाधनों के उपयोग की छूट मिली थी, यदि वह न मिलती तो यह कभी संभव न हो पाता। हुएफेई रेन, मिशिगन स्टेट विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान विभाग और वैश्विक शहरी अध्ययन कार्यक्रम में सहायक प्रोफेसर हैं। लिजा वैनस्टैन शिकागो विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान में पीएचडी की छात्रा हैं।ड्ढr यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के ‘सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी आफ इंडिया’ के सहयोग से प्रकाशित। मूल अंग्रेजी में लेख द्धह्लह्लश्च ज् ष्ड्डह्यन्.ह्यह्यष्.ह्वश्चद्गठ्ठठ्ठ.द्गस्र्ह्व पर भी उपलब्धं

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