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मनहूसियत का महाकाव्य

बाबू जी ने लालकृष्ण आडवाणी का इंटरव्यू पढ़ा और बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा- मैं तो पक्का इन्हीं को वोट दूंगा। मैंने पूछा- ऐसा क्यों? उन्होंने पढ़ा- देखो आडवाणी जी क्या कहते हैं- उनसे पूछा गया कि आप अपने आप में क्या परिवर्तन चाहते हैं। उन्होंने कहा- मैं सोचता हूं मुझमें हास्य बोध और प्रत्युपन्नमति ज्यादा होती तो अच्छा होता.. देखो, देखो वे क्या कह रहे हैं? मैंने कहा- इसका क्या मतलब है। उन्होंने कहा- इसका मतलब है, उनमें हास्य बोध कम है, वे गंभीर आदमी हैं। ऐसा ही आदमी तो देश को चला सकता है। मेरा मानना है कि इस देश को मनहूसियत की सख्त जरूरत है। मैंने कहा- लेकिन गंभीर होने का मतलब मनहूस होना तो नहीं है। उन्होंने कहा- चलेगा, अब सचमुच का मनहूस आदमी तो प्रधानमंत्री हो नहीं सकता, उससे एक दर्जा कम ही सही। देश में इतने हँसोड़ लोग हैं, उनका वोट भी तो है। वे किसी सचमुच के मनहूस आदमी को कैसे जिता देंगे, डेमोक्रेसी है न भाई! मैंने कहा- लेकिन आप मनहूसियत का राज क्यों चाहते हैं। उन्होंने कहा- देखो, हँसोड़ लोग हमेशा मजाक ही करते रहते हैं, देश कहीं मजाक में चलता है? मैंने कहा- लेकिन लोग हँसते-हँसते भी तो काम कर कसते हैं। उन्होंने कहा- वही बात, जो काम हँसी-खुशी, हँसते-हँसते हो जाए वह ठीक काम कैसे हो सकता है। वर्क कल्चर भी तो कोई चीज है। देखो, मनहूसियत एक वैल्यू है, इसे ठीक से समझो, इसका महत्व समझो, तभी तुम तरक्की कर पाआेगे, और देश भी तरक्की कर पाएगा। देखो, अगर लोग हँसते-मुस्कराते रहे तो काम कब करेंगे, उनका मन भी काम में नहीं लगेगा। न वे अपने काम का महत्व समझेंगे, न दूसरे उनके काम का महत्व समझेंगे। अगर मनहूसियत छाई रहेगी तो उनका मन कहीं आेर लगेगा ही नहीं, वे चुपचाप काम करेंगे। मैंने कहा- लेकिन मनहूसियत पैदा कैसे हो? उन्होंने कहा- माहौल खराब करो, लोगों के मन में संदेह और अविश्वास पैदा करो। देखो ‘फूट डालो और राज करो’ मुहावरा है, ‘एकता बनाआे और राज करो’ नहीं। राज गंभीरता से चलता है और फूट भी गंभीरता से डाली जाती है। मुझे लगा कि मैं कोई मनहूसियत का महाकाव्य सुन रहा हूं। मैं बाहर आया और अकेले ही हँस दिया। महाकाव्य हवा में बिला गया।

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  • Web Title: मनहूसियत का महाकाव्य