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अभिभावकों की जेबों पर डाका डाल मालामाल हो रहे स्कूल

ानपुर रोड निवासी आलोक की अपनी स्टेशनरी की दुकान है। इस वर्ष उन्होंने अपने बेटे का कक्षा एक में शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में दाखिला कराया। एडमीशन के बाद बारी आई स्टेशनरी की। स्कूल से बताई गई दुकान में पहुँचे। जो रजिस्टर आलोक अपनी दुकान से फुटकर में 18 रुपए में बेचते हैं, बेटे के लिए वह उन्हें 28 रुपए में खरीदना पड़ा। फर्क यह था कि उक्त रजिस्टर पर स्कूल का नाम छपा था। अकेले आलोक नहीं, सैकड़ों अभिभावक इस तरह रोज ठगे जा रहे हैं।ड्ढr शहर के अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया चल रही है। इसी के साथ ही कॉपी-किताबों की दुकानों पर भीड़ बढ़ गई है। अमीनाबाद के एक स्टेशनरी दुकान के रियाज कहते हैं कि जो कॉपी हम साढ़े आठ रुपए में फुटकर बेच रहे हैं वही कॉपी प्रतिष्ठित स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को 16 रुपए में खरीदनी पड़ रही हैं। एक और रजिस्टर जिसे वह 12 रुपए में बेचते हैं वह स्कूल का नाम लिखने के बाद 28 रुपए में बिक रहा है। रियाज कहते हैं कि कीमतें सिर्फ कमीशनबाजी से बढ़ी हैं। अमीनाबाद के ही एक बुक डिपो के मालिक सुल्तान हुजुर कहते हैं कि स्टेशनरी के दाम स्कूल संचालकों व प्रिन्टिंग प्रेस के गठजोड़ से आसमान छू रहे हैं। जो ज्यादा कमीशन देता है उसी को वह छापने का ठेका देते हैं। बिरहाना के एक स्टेशनरी विक्रेता एल.के. श्रीवास्तव कहते हैं कि अगर छात्रों व उनके अभिभावकों को खुले बाजार में कॉपी-किताबें खरीदने की आजादी मिल जाए तो उन्हें काफी राहत मिल जाएगी। ड्ढr

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