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हाथों से फिसलती इस्पाती महंगाई

धुंध तो पूरी दुनिया पर ही छाई है - दो तरह की धुंध। इनमें से एक तो है ग्लोबल वार्मिग की धुंध। इससे समय-असमय आंधी तूफान और बारिश आती है। फसलें चौपट होती हैं। और दूसरी वह है जो अर्थव्यवस्थाआें को अपनी चपेट में ले रही है। यह है मुद्रास्फीति यानी महंगाई की धुंध। भारत में जहां सरकार मानवतावादी किस्म के आर्थिक सुधार की बात करती है और आम आदमी के नाम पर अपनी राजनीति साधती है, वहां इसे लेकर परेशानी खड़ी होनी स्वाभाविक ही है। मुद्रास्फीति पिछले साल के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है और सुरसा के मुंह की तरह लगातार बढ़ ही रही है। वह भी तब, जब कई विधानसभाआें के चुनाव होने वाले हैं और फिर अगले साल आम चुनाव तो हैं ही।ड्ढr कंेद्र सरकार ने इससे निपटने के लिए अपनी तरफ से आहुति दे दी है। उसने खाद्य तेल पर होने वाली आयात शुल्क की कमाई का मोह छोड़ दिया है। साथ ही गैर बासमती चावल के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है। इस्पात निर्यात के प्रोत्साहन भी खत्म कर दिए गए हैं। स्टील उत्पादकों के संगठन द इंडियन स्टील एलायंस ने इसके विरोध में अखबारों में आधे पेज का विज्ञापन भी जनहित के नाम पर छपवाया। इसमें सरकार से इस्पात उद्योग में इस्तेमाल होने वाले सामान में उत्पादन शुल्क में राहत मांगी गई है। तर्क यह भी है कि अगर सरकार इस्पात उत्पादों से 14 फीसदी का उत्पाद शुल्क हटा लेती है, तो उपभोक्ताआें के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का सामान काफी सस्ता हो जाएगा। इस पर कें द्रीय वित्तमंत्री की प्रतिक्रिया काफी तीखी थी। उनका कहना था कि इस्पात कंपनियों को कीमतें नहीं बढ़ानी चाहिए। मार्च के महीने में मूलभूत धातुआें का थोक मूल्य सूचकांक बीस फीसदी तक बढ़ गया था। चिदंबरम ने इस उद्योग के प्रतिनिधियों से मुलाकात में कहा था कि अगर कीमतों पर लगाम लगाने के लिए उन्हें विकास दर को नीचे लाना पड़ा तो भी वे हिचकिचाएंगे नहीं। यह साफ नहीं है कि इससे उनका आशय क्या था। क्या वे बैंक दरों और ब्याज दरों को बढ़ाना चाहते हैं, जिससे उद्योगों के लिए नए निवेश का आकर्षण खत्म हो जाए और साथ ही अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति भी कम हो जाए। अगले ही दिन वित्तमंत्री ने यह भी कहा कि विकास में सब को शामिल होना चाहिए। अगर मुद्रा आपूर्ति को कम करने वाली ज्यादा ब्याज दरें आधे भारतीयों को प्रभावित करती हैं तो आवश्यक चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी पूरे देश को परेशान करती है। जिनमें वे लोग भी हैं, जो बैंक शाखाआें से दूर गरीबी की रेखा के नीचे जीते हैं। आधा हिन्दुस्तान ऐसा है, जिसे स्टील की जरूरत टीन की छत के लिए होती है। स्टील निर्माताआें ने जब डय़ूटी एनटाइटिलमेंट पासबुक स्कीम की बात की तो उनके दिमाग में शायद वित्तमंत्री का यही बयान था। इस पासबुक के जरिए इस्पात निर्यातकों को हर टन इस्पात निर्यात पर रियायत मिल जाती है। ज्यादातर तरह के स्टील की घरेलू बाजार में कीमत प्रति टन अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत से 200 डॉलर कम है, फिर सरकार निर्यात प्रोत्साहन क्यों देना चाहती है। स्टील की कीमतों ने थोक मूल्य सूचकांक पर 2004 में ही असर डालना शुरू कर दिया था। इस समय स्टील का आयात 15 लाख टन से बढ़कर 21 लाख टन तक पहुंच गया था। तब तक खत्म कर दी गई पासबुक योजना एक बार फिर से शुरू कर दी गई। जनवरी 2003 से अगस्त 2004 तक हॉट रोल्ड क्वाइल के दाम 000 रुपए प्रति टन तक बढ़ गए। कोल्ड रोल्ड क्वाइल में भी ऐसा ही नाटकीय उछाल दिखाई दिया। इनका इस्तेमाल टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुआें और ऑटोमोबाइल उद्योग में होता है और मांग भी वहीं पैदा हो रही थी। इस साल ये दोनों ही क्षेत्र तरक्की की दौड़ में पिछड़ गए इसलिए स्टील के खरीदार कम हो गए। स्टील की कीमतों में 30 फीसदी बढ़ोतरी ब्लूम, बिलेट और स्लैब की कीमतों में आती है। 25 फीसदी इस्पाती तारों में और बीस फीसदी टेनसाइल प्लेट्स, बार और रॉड आदि में। बार, रॉड, प्लेट्स और तार आदि ऐसी चीज हैं, जिनका निर्माण उद्योग में भारी पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इस बीच निर्माण उद्योग जो सीमेंट की बढ़ती कीमतों से परेशान था, वह स्टील की बढ़ती कीमतों की भी शिकायत करने लगा। वित्तमंत्री भी इस मामले में ज्यादा मदद कर पाने की स्थिति में नहीं थे। पूरी दुनिया में स्टील की कीमतें निर्माण कारोबार को महंगा बना रही हैं। दुनियाभर में अगर इस्पात उद्योग की क्षमता तेजी से बढ़ रही है और इसका उत्पादन एक अरब टन से ऊपर पहुंच गया है, तो इसकी वजह चीन, भारत, ब्राजील और रूस जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं। चीन बहुत तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में लगा है और दुनिया की क्षमता का तकरीबन 37 फीसदी उत्पादन कर रहा है। उसकी खपत भी लगभग इतनी ही है। रूस के पास तेल और गैस की अकूत दौलत आ गई है, इसलिए उसकी प्रति व्यक्ित इस्पात की खपत लगातार बढ़ रही है। ब्राजील का तेजी से औद्योगीकरण हो रहा है। और भारत का इरादा ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना के तहत 2,002,000 करोड़ रुपए की लागत से सड़क, बंदरगाह, हवाई अड्डे, रेलवे, विद्युत परियोजनाआें आदि को तैयार करने का है। इन सबसे भी स्टील की मांग बढ़ी है। भारतीय स्टील उत्पादकों की योजना 2012 तक अपनी स्टील उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर दस करोड़ टन तक ले जाने की है, लेकिन शायद यह भी काफी न हो। भारत में स्टील की खपत 18 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। यह आंकड़ा उत्पादन क्षमता से कहीं ज्यादा है, जो महज पांच फीसदी की दर से ही बढ़ रही है। ऐसे में इस्पात की कीमतों को बढ़ने से भला कौन रोक सकता है। लेकिन क्या यह मुद्रास्फीति का उजला पक्ष नहीं है।ड्ढr लेखिका वित्तीय मामलों की जानकार हैं

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