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मंडन मिश्र का घर

शंकराचार्य कलाडी (केरल) से देशभ्रमण करने निकले। चारों कोनों पर चार मठों की स्थापना की। भ्रमण करते हुए वे स्थानीय पंडितों से शास्त्रार्थ भी करते थे। अपने अद्वैतवाद का प्रचार-प्रसार भी। जनक के पूर्वज राजा मिथि के नाम पर बना मिथिला क्षेत्र अपने सांस्कृतिक तत्वों के विभिन्न रूपों के लिए प्रसिद्ध था। मिथिला में एक-से-एक पंडित दूर-दूर से आते थे। वहां कई-कई दिन चलने वाले शास्त्राथरे में जीवन-जगत से संबंधित विषयों पर वाद-विवाद होता था। विजयी पंडितों का विशेष सम्मान होता था। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने मिथिला के महापंडित मंडन मिश्र का नाम और ज्ञान की ख्याति सुनी। वे उनके गांव जहां कुएं पर पानी भर रहीं महिलाएं संस्कृत में वार्तालाप कर रहीं थीं। शिष्य ने उनसे पूछा, ‘मंडन मिश्र का घर कहां है?’ उनमें से एक स्त्री ने बताया, ‘आगे चले जाइए। जिस दरवाजे पर तोते शास्त्रार्थ कर रहे हों, वही पं. मंडन मिश्र का घर होगा।’ शंकराचार्य शिष्यों के साथ आगे बढ़े। बांस के झुरमुट, धान से लहलहाते खेत जैसे मनोरम दृश्य देखते बढ़ते महिषी गांव पहुंचे। मंडन मिश्र का घर खोजने में परेशानी नहीं हुई। एक घर के द्वार पर पिंजड़े में तोते शास्त्रार्थ कर रहे थे। शंकराचार्य ने जान लिया कि वही मंडन मिश्र का घर था। मंडन और उनकी विदुषी पत्नी भारती ने आदर-सत्कार किया। आस-पड़ोस के पंडित भी आ जुटे। सेवा सत्कार के बाद शास्त्रार्थ होना था। दोनों के बीच निर्णायक की तलाश हुई। पंडितों ने कहा, ‘आप दोनों के शास्त्रार्थ में हार-जीत का निर्णय करने के लिए पंडिता भारती ही उपयुक्त रहेंगी।’ड्ढr दोनों में शास्त्रार्थ कई दिन चला। अंत में भारती ने शंकराचार्य को विजयी घोषित किया। पर कहा, ‘मंडन मिश्र विवाहित हैं। मैं और मेरे पति मंडन मिश्र, हम दोनों मिलकर एक इकाई बनाते हैं। अर्धनारेश्वर की तरह। आपने अभी आधे भाग को हराया है। अभी मुझसे शास्त्रार्थ बाकी है।’ कहते हैं कि शंकराचार्य ने उनकी चुनौती स्वीकार की। दोनों के बीच जीवन-जगत के प्रश्नोत्तर हुए। शंकराचार्य जीत रहे थे। परंतु अंतिम प्रश्न भारती ने किया। उनका प्रश्न गार्हस्थ जीवन में स्त्री-पुरुष के संबंध के व्यावहारिक ज्ञान से जुड़ा था। शंकराचार्य को उस जीवन का व्यवहारिक पक्ष मालूम नहीं था। उन्होंने ईश्वर और चराचर जगत का अध्ययन किया था। वे अद्वैतवाद को मानते थे। भारती के प्रश्न पर उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली। और सभामंडप ने पंडिता भारती को विजयी घोषित कर दिया। यह प्रसंग सबूत है कि हमारे समाज में स्त्रियां जीवन के हर क्षेत्र में बराबर की भागीदारी निभाती थी। घर परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए ज्ञान अर्जित कर शास्त्रार्थ भी करती थी। पति-पत्नी के बीच पूरकता का भाव होता था। स्त्री-पुरुष के गुणों में कोई भेद रेखा नहीं थी। यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि ज्ञान जगत में भी पति-पत्नी मिलकर इकाई बनते हैं। आज निजी जीवन जीने के आग्रही पति-पत्नियों के लिए भी यह उदाहरण वंदनीय है। इन प्रसंगों को युवापीढ़ी को पढ़ाना और सुनाना आवश्यक है। वे सब भारतीय महिलाआें के गौरवमय इतिहास से परिचित होंगे ही, स्त्री-पुरुषों के संबंध के ऐसे रूप भी उनके सामने आएंगे।ं

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