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जीवन की चुनौती

‘जीवन कितना? अति लघु क्षण!’ हम न इस संसार में आने का फैसला करते हैं, न जाने का, न अपना वंश, परिवार चुनते हैं, न किस्मत। पर एक बार आने और इससे जुड़ने के बाद इसे अंतहीन मानने लगते हैं। जबकि वास्तव में जीवन के आरंभ से ही अंत का खतरा पैदा हो जाता है। हर दिन जो हम जीते हैं, हमें मौत के एक कदम पास ले जाता है। हम भ्रमवश एक-एक तिनका जोड़ते हैं, भविष्य की सुंदर कल्पनाएं संजोते हैं, अपनी चीजों पर ‘मैं’ की मुहर लगाते हैं, पर हम कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते। आने वाले खतर की कोई चेतावनी नहीं मिलती, न ही इस जीवन को जीने का दूसरा मौका। इसीलिए जब परशानी आती है तो हम घबरा जाते हैं। पल भर में सार सुंदर सपने और स्थितियां गायब हो जाती हैं, निराशा का अंधेरा घेर लेता है। गड़गड़ाते बादल, चमकती बिजली हौसला तोड़ने लगते हैं। ऐसे में डर कर छिप जाना ही एक उपाय लगता है। क्योंकि मौसम की तरह जीवन की बदलती परिस्थितियों को भी हम नकार नहीं सकते। पर अंतत: मुकाबला ही करना पड़ता है। जब बार-बार चुनौतियां आती जाती हैं, तब हारकर उनका सामना करने की सामथ्र्य जुटानी पड़ती है। हम उस कठिन घड़ी से जूझने के लिए भगवान से मदद मांगते हैं। जीवन जसा है, वैसा ही स्वीकारते हैं, क्योंकि सच्चाई से भागने की कोशिश दर्द को असहनीय बना देती है। शायद इसी को बहाव के साथ बहना कहते हैं। भगवान ने हमें जो सोचने, समझने, महसूस करने और चाहने की क्षमता दी है, उसी के बल पर हम चुनौतियों से लड़ने के बाद समझौता करना सीख लेते हैं। उनकी असीम शक्ित के बल पर चित्त को वश में कर आहत, दु:खी बचे-खुचे जीवन को फिर से जीना सीखते हैं। समय के साथ परशानियां भी उतना विचलित नहीं कर पातीं। इन्हीं के कारण हमारी सच्ची शक्ित प्रकट होती है। हम चुनौतियों से लड़ना सीख जाते हैं।

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