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वृद्धा की कहानी-दफ्तरों में धक्के-आखों में पानी

उम्र 75 वर्ष। दिनचर्या सुबह-शाम आंसू बहाना या फिर सरकारी दफ्तरों में धक्के खाना। आंसू इसलिए कि जवान बेटा, बहू और पोते-पोती समेत छह लोग समझौता ट्रेन बम ब्लास्ट में मारे गए। दफ्तरों के धक्के इसलिए कि मुआवजे के नाम पर बस बेरुखी ही नसीब हुई। अब इस बुजुर्ग महिला ने रेलवे ट्रिब्यूनल में गुहार लगाई है। अब बस या तो अधिकारी जानते हैं या फिर ऊपर वाला कि उसे अपना जीवन रहते कुछ मिलेगा भी या नहीं। यह दुखभरी कहानी है बिहार स्थित गया जिले के न्यू करीमगंज मोहल्ले में रहने वाली मैमूना खातून की।ड्ढr ड्ढr कंपकंपाते होठों से वह बताती है कि करीब 20 साल पहले उसका बड़ा बेटा शब्बीर अहमद (35) मौसी के पास पाकिस्तान के कराची शहर गया था। वह वहीं बस गया। उसने वही पर शादी भी कर ली। वर्ष 2007 में उसे सूचना मिली कि शब्बीर अपनी पत्नी समीना खातून (26), बेटी मिस्बाह (11) व तीन बेटों मो. शहबाज (शहरेयार (8) व शहरोज (6) को लेकर उससे मिलने आ रहा है। उसे लगा कि उसकी बीस साल की तपस्या का फल एक साथ मिल गया है। बेटा परिवार के साथ दो सप्ताह तक उसके पास रहा। लेकिन 18 फरवरी 2007 की रात वह समझौता एक्सप्रेस से पाकिस्तान जाते वक्त ब्लास्ट का शिकार हो गया।ड्ढr ड्ढr उस पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा। उसके छोटे बेटे जावेद ने मुआवजे के लिए साल भर मंे गया से दर्जनों चक्कर लगाये, लेकिन बात नहीं बनी। अब एक साल बाद वृद्धा ने दिल्ली आकर अपने वकील अनिल कुमार गोयल के माध्यम से रेलवे ट्रिब्यूनल में दावा डाला है। बिहार से दिल्ली आकर मुकदमा लड़ने की दिक्कतों के चलते वृद्धा ने सरोजनी नगर मिनी मार्केट एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक रंधावा को मुकदमा लड़ने के लिए अधिकृत किया है। वृद्धा के वकील श्री गोयल ने बताया कि केवल डीएनए को आधार बनाकर पीड़ित परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

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