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पवार की रणनीति

पहले किसानों का कर्जा माफी का श्रेय लूटने की होड़ और अब सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई का ठीकरा एक-दूसरे के सिर पर फोड़ने की कोशिश से कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के रिश्तों में गहरी खटास पैदा हो गई है। दोनों दल के नेता एक-दूसरे के विरु सार्वजनिक बयानबाजी कर रहे हैं, जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की छवि के लिए घातक है। सबसे बड़ा दल होने के नाते गठबंधन के एक दर्जन दलों को साथ रखना कांग्रेस का दायित्व है, किन्तु अन्य पार्टियों से भी संयम बरतने की अपेक्षा की जाती है। मेघायल और नगालैंड विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया और शरद पवार की पार्टियों के बीच बना छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। उत्तर पूर्व के इन राज्यों में राकांपा ने धुर कांग्रेस विरोधी शक्ितयों से हाथ मिला लिया, जिसे गठबंधन धर्म के प्रतिकूल ही कहा जाएगा। साथ चुनाव लड़ने और आगामी आम चुनाव में मनमोहन सिंह को संप्रग का प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित करने का मुद्दा उछालकर पवार की पार्टी ने कांग्रेस को असहज स्थिति में डालने की कोशिश की थी। राकांपा के ताजा बयान में मनमोहन सिंह सरकार को तो लोकतांत्रिक बताया है, जबकि संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी की कार्यप्रणाली पर रोष व्यक्त किया गया है। क्या इसे कांग्रेस पार्टी की गुटबाजी को हवा देना समझा जाए? केंद्र के अलावा महाराष्ट्र व कई राज्यों में कांग्रेस व राकांपा सत्ता के साझीदार हैं फिर भी दोनों के बीच अविश्वास है, तो इसका कारण खोजा जाना चाहिए। संप्रग के कुछ महत्वपूर्ण घटक महंगाई, पानी व कार्यप्रणाली क ो लेकर कांग्रेस से असंतुष्ट हैं। पवार की पार्टी ने तो माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में तीसरा मोर्चा खड़ा करने की बात तक कही है। ज्यों-ज्यों चुनाव निकट आएंगे राजनैतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होती जाएगी। साम्प्रदायिक शक्ितयों का मुकाबला करने के मुद्दे पर कांग्रेस राकांपा व वामदलों में कोई मतभेद नहीं है। शायद समस्या कांग्रेस की कार्यप्रणाली से है। गठबंधन सरकार चलाने का कांग्रेस का तजुर्बा भी पहला है। आशा की जानी चाहिए कि मनमोहन सरकार में शामिल सभी दल अपने गिले-शिकवे शीघ्र दूर कर लेंगे। इसके लिए पहल तो वरिष्ठ दल कांग्रेस को ही करनी चाहिए।

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  • Web Title: पवार की रणनीति