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महंगाई पहुंची ‘सातवें’ आसमान पर

महंगाई के चक्रव्यूह में फंसी मनमोहन सिंह सरकार को इससे निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं दीख पड़ रहा है। चीनी, चना, सरसों का तेल, वनस्पति, फलों, सब्जियों, दालों, अनाज, लोहा, सीमेंट, खनिज और प्याज की कीमतों में पिछले एक महीने के दौरान 11 फीसदी बढ़ोतरी से मुद्रास्फीति की दर 7 फीसदी जा पहुंची जो पिछले 3माह में अधिकतम है। हालांकि चावल, गेहूं, आटा, तुअर, मूंगफली, आलू और नमक की कीमतों में इस दौरान कोई घट-बढ़ नहीं हुई।ड्ढr ड्ढr दूसरी आेर डॉलर के कमजोर होने और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के और मंद होने के समाचारों के बीच अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 104 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई। इधर सरकार ने लाख जतन किए लेकिन महंगाई की रफ्तार है कि थमने का नाम नहीं लेती। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई की दर 22 मार्च को समाप्त सप्ताह में सात प्रतिशत तक पहुंच गई है। गत 15 मार्च को यह 6.68 फीसदी पर थी। महंगाई की वर्तमान दर उसी स्तर पर पहुंच गई है जहां वह चार दिसम्बर 2004 को थी। वित्त सचिव डी. सुब्बा राव ने महंगाई बढ़ने को चिंताजनक बताते हुए कहा कि सरकार कीमतों की लगातार समीक्षा करेगी। उधर, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद ने महंगाई पर कहा, बजट का फीलगुड खत्म हो रहा है जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि देश में गेहूं का पर्याप्त भंडार है। पवार ने कहा कि कीमतें गिरने में अभी समय लगेगा। महंगाई से निपटने के लिए सरकार ने बासमती चावल के निर्यात पर दी जा रही रियायत को शुक्रवार को वापस ले लिया है। सरकार पहले ही इसके निर्यात मूल्य में सौ डालर प्रति टन की बढ़ोतरी कर चुकी है।ड्ढr ड्ढr महंगाई बढ़ने का सीधा असर रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर पड़ेगा जो मुद्रा प्रवाह रोकने के लिए कड़े कदम उठा सकता है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी का मानना है कि रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) और रेपो दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इससे ब्याज दरें कम होने की जो उम्मीद जग थी उस पर कुठाराघात हो सकता है। सरकार ने सुरसा का मुंह बनी महंगाई पर ताला डालने के लिए खाद्य तेलांे पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया। लेकिन महंगाई ने चीनी, चना और कुछ अन्य रोजमर्रा की चीजों को सीढ़ी बना लिया। ऐसे में सरकार के पास जो एक कड़वा विकल्प रह जाता है, वह है पहले से ही ऊंची ब्याज दर को और महंगा बनाया जाए। जाहिर है कि इसकी कीमत विकास दर में कुछ कमी से चुकानी होगी। इससे निकट- भविष्य में आम आदमी के अपना घर का सपना भी मृग-मरीचिका बन जाएगा। साल भर से भी कम समय में सिर पर खड़े चुनाव को देखते हुए सरकारी तंत्र से ‘जमाखोरी’ और ‘कालाबाजारी’ के खिलाफ दहाड़ सुनाई देने लगी है। फिक्की के अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखरन ने कहा ‘भारतके मामले में कृषि क्षेत्र की विकास दर में गिरावट ने और भी आग लगाई है।’ उनका यह बयान निकट-भविष्य में कीमतों में कमी आने का कम से कम संकेत नहीं ही देता है, ‘अगर आप मुझसे कीमतों में बढ़ोतरी न करने की कहते हैं तो मैं ऐसा एक दिन या ज्यादा से ज्यादा एक महीने के लिए कर सकता हॅूं।ड्ढr ड्ढr अंत में तो यह बाजार है जो कीमत तय करेगा।’ हालांकि व्यापारियों के मुताबिक, सरकारी प्रयास का असर अगले सात से दस दिनों में दिखने लगेगा। भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष और कृषि मामलों के जानकार कृष्ण वीर चौधरी ने तेजी से पांव पसार रही मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक वस्तुआें के वायदा और बड़े घरानों के खुदरा कारोबार में प्रवेश पर तुरंत रोक लगाए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार मंहगाई को काबू में करना चाहती है, तो उसे सबसे पहले आवश्यक वस्तुआें में वायदा कारोबार को रोकने के साथ ही बड़े घरानों को रोटी-दाल के कारोबार से हटाना होगा। उन्होंने कहा कि सरकार महंगाई को रोकने के जो कदम उठा रही है, उन्हें किसी तरीके से सही नहीं ठहराया जा सकता। यह कदम अल्पकालिक लिहाज से तो कुछ मददगार साबित हो सकते हैं, किंतु दीर्घकालिक सफलता के लिए उत्पादन को बढ़ाने के साथ ही खाद्यान्न व्यवस्था के बाजार को सरकारी नियंत्रण में रखना होगा।

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