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शक्ित साधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका है दुर्गा सप्तशती का पाठ

वर्ष में चार नवरात्र होते हैं-वासंतिक, आषाढ़ीय, शारदीय, माघीय। इन नवरात्र में चैत्र एवं आश्विन का नवरात्र लोकप्रसिद्ध है, जबकि आषाढ़ और माघ का नवरात्र गुप्त नवरात्र कहा जाता है। नवरात्र में शक्ित साधना का सरल उपाय दुर्गा सप्तशती का पाठ है। नवरात्र के दिवस काल में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती के पाठ के कई विधि विधान है। दुर्गा सप्तशती महर्षि वेदव्यास रचित मार्कण्डेय पुराण के सावर्णि मन्वतर के देवी महात्म्य के सात सौ श्लोक का एक भाग है। दुर्गा सप्तशती में अध्याय एक से तेरह तक तीन चरित्र विभाग हैं। इसमें सात सौ श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती के छह अंग तेरह अध्याय को छोड़कर हैं। कवच, कीलक, अर्गला दुर्गासप्तशती के प्रथम तीन अंग और प्रधानिक आदि तीन रहस्य हैं। इसके अलावा और कई मंत्र भाग है जिसे पूरा करने से दुर्गा सप्तशती पाठ की पूर्णता होती है। इस संदर्भ में विद्वानों में मतांतर है। दुर्गा-सप्तशती को दुर्गा-पाठ, चंडी-पाठ से भी संबोधित करते हैं। चंडी पाठ में छह संवाद है। महर्षि मेधा ने सर्वप्रथम राजा सुरथ और समाधि वैश्य को दुर्गा का चरित्र सुनाया। तदनंतर यही कथा महर्षि मृकण्डु के पुत्र चिरंजीवी मार्कण्डेय ने मुनिवर भागुरि (क्रौप्टिक) को सुनायी। यही कथा द्रोण पुत्र पक्षिगण ने महर्षि जैमिनी से कही। जैमिनी महर्षि वेदव्यास जी के शिष्य थे। यही कथा संवाद महर्षि वेदव्यास ने मार्क ण्डेय पुराण में यथावत् क्रम वर्णन कर लोकोपकार के लिए संसार में प्रचारित की। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के चरित्रों का वर्णन है। ड्ढr पं रामदेव पांडेय

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