DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चुनाव प्रचार में चिरकुटई का तड़का

‘इस सा. ने तो दिमाग की दही कर दी। इसे कैड़ा करके सूतना पड़ेगा..’ हाल के दिनों में देश के तमाम बड़े-छोटे नेताओं ने अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता का जिस बिंदास अंदाज से इस्तेमाल किया है, उसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि देर सबेर भाषणों में इस तरह के वाक्य सुनने को मिल जाएंगे। अमर सिंह, राबड़ी देवी, राज बब्बर, सत्यव्रत चतुव्रेदी, लालू यादव जसे नेता एक नई परिपाटी बना रहे हैं। अब नेतागण वैसे शब्दों का बिना संकोच इस्तेमाल कर रहे हैं, जो पहले संसदीय डिक्शनरी में नहीं थे, लेकिन अब धीरे-धीर लोकप्रिय हो रहे हैं। राबड़ी देवी ने बिहार के मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी जदयू सांसद लल्लन सिंह के लिए ‘साला’ शब्द का इस्तेमाल किया। खास बात यह है कि आम बोलचाल और बॉलीवुड की फिल्मों में आमतौर पर स्वीकृत इस शब्द का शायद पहली बार सार्वजनिक इस्तेमाल किसी बड़े नेता, खासकर महिला नेता ने किया है। चंद साल पहले अब कांग्रेस में शामिल राज बब्बर ने तब अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता अमर सिंह को ‘दलाल’ शब्द से संबोधित किया था। कांग्रेस के सत्यव्रत चतुव्रेदी ने कुछ समय पहले सपा नेता अमर को ‘चिरकुट’ कहा। जवाब में अमर ने कहा कि ‘हां, मैं चिरकुट हूं’। इन दो नेताओं के संवाद के बाद यदा कदा अखबारों में नेतागण एक दूसर की तारीफ में चिरकुट शब्द का इस्तेमाल करते पढ़े जाते हैं। वैसे, चिरकुट शब्द के मूल में जाएं तो उत्तरप्रदेश, बिहार में इस्तेमाल होने वाले इस शब्द का वास्तविक अर्थ हवा में उड़ जाने लायक मुट्ठी भर अनाज है। बिहार में राजस्व रिकॉर्ड से संबंधित एक दस्तावेज को चिरकुट कहा जाता है। साला एक गाली है या नहीं, यह आमतौर पर इस पर निर्भर करता है कि जिसे साला कहा गया है, वह इसे किस अर्थ में ले रहा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: चुनाव प्रचार में चिरकुटई का तड़का