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भारतीय राजनीति की सुदामा ग्रंथि और उच्च शिक्षा

सुदामा : ‘जे तप ते परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहिं इच्छा॥’ड्ढr सुदामा पत्नी : ‘या घर ते कबहूँ न गयो पिय, टूटो तवा अरु फूटी कठौती॥’(सुदामा-चरित)ड्ढr ‘‘(फीस में) यह बढ़ोतरी (संस्थान द्वारा) मुनाफा कमाने के लिए नहीं की गई है। (संस्थान को) पढ़ाए जा रहे कोर्स का खर्चा भी तो जुटाना होता है।’’ड्ढr (विजयपत सिंहानिया : आई.आई.एम.अहमदाबाद के प्रमुख) हाल ही में देश के अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले छ: मैनेजमेंट प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा अपनी फीस बढ़ा देने से एक बार फिर भारतीय राजनीति की वह विचित्र सुदामा ग्रंथि सतह पर उभरने लगी है, जिसके अनुसार छात्र को राजसी भविष्य के लिए तैयार कराने वालों का खुद फटेहाली में जीना बहुत जरूरी है। इससे पहले भी 2003 में (जब आज विपक्ष में बैठी राजग सरकार सत्ता में थी) तो आई.आई.एम. संस्थानों द्वारा फीस बढ़ाने पर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्रालय ने हुक्म जारी कर दिया था, कि संस्थान अपनी सालाना फीस 30 हजार रुपए से अधिक नहीं बढ़ा सकते। सरकार उनकी निगहबान है, और सरकार (यानी मानव संसाधन मंत्री जी) की नजरों में संस्थान द्वारा फीस की सीमा बढ़ाकर हर छात्र पर किए जाने वाले वास्तविक सालाना खर्चे (साढ़े तीन लाख रुपए) तक लाया जाना अनुचित है। क्योंकि इससे कमजोर वगरे के छात्रों के लिए इन संस्थानों में शिक्षा पाना असंभव हो जाएगा। लंबी बहस के बाद फीस बढ़ोतरी स्थगित हो गई। आज जब बात दोबारा उभरी है, तो फिर से तनिक फर्क भाषा में ‘आम आदमी’ का नाम लेकर वही पुराना डरौना खड़ा किया जा रहा है, कि फीस बढ़ी तो संस्थान सिर्फ इलीट वर्ग के लिए आरक्षित हो जाएंगे। सही तो यह है, कि शिक्षा लोन देने के लिए एक दूसरे को धकियाते हुए आगे आ रहे बैंकों के चलते, आम आदमी के मन में अपने बच्चे की फीस न दे पाने का कोई खास डर नहीं रहा। आज उनकी मुख्य (और शायद इकलौती) चिन्ता इसी बात को लेकर है, कि उनका बच्चा इन संस्थानों की प्रवेश-परीक्षा में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण हो जाए, क्योंकि एक बार अच्छे आईआईएम या आईआईटी में प्रवेश मिल गया तो छात्रों को न तो लोन पाने में कोई कष्ट होता है, और न ही उसे चुकाने में। इसलिए फीस बढ़ोतरी मुद्दे को लेकर असली तनाव अभिभावकों और संस्थानों के बीच नहीं, बल्कि पूरी उच्चशिक्षा पर अपना वर्चस्व प्रमाणित करने को आतुर मंत्रालय और संस्थानों के बीच ही है। यह भी उल्लेखनीय है, कि योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने, जो एक राजनेता नहीं बल्कि एक सम्मानित अर्थशास्त्री हैं, संस्थानों द्वारा फीस बढ़ाने को तर्कसंगत और समयानुकूल कहकर पूरा समर्थन दिया है। उनकी राय में आज यह संस्थान प्रशिक्षण पर हो रहे कुल खर्चे, शिक्षकों की सम्मानजनक तनख्वाहें और बहुमूल्य शोधपरक काम सरीखी कामकाजी जरूरतों को पुरानी फीस के जरिए अब ठीक से पूरा नहीं कर सकते। और अगर यह जरूरतें पूरी न हुईं, तो आगे जाकर इन अंतरराष्ट्रीय ख्यातिवाले संस्थानों की गुणवत्ता में भारी गिरावट आना तै है। अत: बेहतर हो, कि राज्य यह सुनिश्चित करे कि गरीब पृष्ठभूमि से आए हर उत्तीर्ण छात्र को पूरी फीस चुकाने के लिए बैंक की मार्फत तुरत और आसानी से एक लोन पैकेज मिल जाए। यह उम्मीद, कि संस्थान अपने शिक्षकों, परिसर और प्रयोगशालाआें को फटेहाल और संसाधन विहीन रखने की कीमत पर भी अपनी फीस को नगण्य बनाए रखे, अव्यावहारिक बात है। आजादी के बाद के 60 वषरे में केन्द्र सरकार खुद अभी तक देश में सिर्फ 7 आईआईटी और छ: मैनेजमेंट संस्थानों की स्थापना कर पाई है। इन संस्थानों से, जिनके स्नातकों को आज पूरी दुनिया मान्यता देती है, हर साल 5000 इंजीनियर और मैनेजमेंट के 1200 स्नातकोत्तर छात्र निकलते हैं, जबकि कुल जरूरत इससे कहीं बड़ी है। चिकित्सा क्षेत्र में ही आज छ: लाख डॉक्टरों, दो लाख दन्त चिकित्सकों और 10 लाख नसरे की कमी है। नौकरी के बाजार में इंजीनियरों, मैनेजरों तथा डॉक्टरों की भारी माँग होते हुए भी सरकारें क्यों ऐसे अधिक संस्थान नहीं स्थापित कर सकीं? जानकारों के अनुसार हर नए आईआईटी की स्थापना पर साढ़े सात सौ करोड़ रुपए का खर्चा आएगा, और हर नए आईआईएम की स्थापना पर 200 करोड़ रुपए का! हिसाब लगाने से दिखता है, कि संप्रग वादे के मुताबिक काम करेगी तो उसे अगले छ: सालों में 5700 करोड़ रुपयों की जरूरत होगी। क्या वह यह राशि हँसते हँसते दे पाएगी? और (यदि वह चुनाव पुन: जीत पाई तो) यह काम पूरा कब तक करेगी? जवाब अभी हवा में टँगे हैं। संप्रग ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल में ही यह वादा दोहराया है, कि आने वाले छ: सालों में 8 नए आईआईटी, 7 नए आईआईएम, 14 नए विश्वविद्यालय और 16 केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनाए जाएंगे! लंबी याददाश्त वाले लोग भूले न होंगे कि राजग ने भी अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में आईआईटी की संख्या (कुछेक क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों को अपग्रेड करके) 12 तक ले जाने का वादा किया था। वह भी सरकार के अपदस्थ हो जाने से कोरा वादा ही बना रहा। आज की तारीख में चुनौती जितनी संस्थानों की तादाद ताबड़तोड़ बढ़ाने की है, उससे कहीं बड़ी यह है, कि पहले मौजूदा संस्थानों तक बढ़िया प्रशिक्षकों की निरंतर आमद कैसे सुनिश्चित की जाए? आज चिकित्सा, प्रबंधन तथा इंजीनियरिंग के हर राष्ट्रीय संस्थान में अच्छे प्रशिक्षकों की गहरी कमी हो चुकी है। और उच्च शिक्षा संस्थान सिर्फ बढ़िया इमारतों के बूते नहीं बना करते। किसी भी संस्थान का प्राण होती है उसकी शिक्षण फैकल्टी, और यहाँ हमारी बढ़ती दुर्बलता बेहद चिंताजनक है। मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अजरुनसिंह देश के कुशलतम नेताआें और प्रशासकों में हैं, अगर उनका मंत्रालय अपने वादे को लेकर गंभीर है, तो बेहतर हो कि फीस बढ़ोतरी पर राजग के बिछाए जाल में फँसने की बजाए वह यह सुनिश्चित करे, कि हमारे हर उच्चशिक्षा संस्थान को पहले अपने शिक्षकों के लिए बेहतर वेतनमान और विश्वस्तरीय शोध सुविधाओं से लैस प्रयोगशालाएँ तो मिलें। छठे वेतन आयोग की रपट भी इस दिशा में निराश करती है, क्योंकि उसने शिक्षकों की बजाए संस्थानों के नियामकों के लिए बेहतर वेतनमानों की पेशकश की है (जबकि राष्ट्रीय ज्ञान आयोग इन नियामक संस्थाआें : यूजीसी तथा ए.आई.सी.टी.ई. को बंद करने का पक्षधर है)। कुल मिलाकर आज छात्रों की फीस पर तलवारें भाँजने से पहले शिक्षकों और गुरुकुलों को बचाना जरूरी है। लेकिन शिक्षकों को कुछेक महीनों या सालों की फैलोशिप का चारा देकर एक अच्छी स्थायी फैकल्टी बनाना भी नामुमकिन है। जब उनके छात्रों को कैंपस पर ही करोड़ों की नौकरियाँ मिल रही हों तो। हमारे शिक्षकों से सांदीपनि और द्रोणाचार्य की तरह सपरिवार वल्कल और कंदमूल पर ही रखने की यह कैसी मूर्ख अपेक्षा है? अगर हमें गुणवत्ता की सचमुच परवाह है, तो हमें अपनी उच्चशिक्षा के संस्थानों और उसको चलाने वालों को उनकी गर्वीली गरीबी से अविलंब मुक्त करना होगा। इस बाबत जो विचार द्वापर युग में सुदामा की पत्नी और द्रोणाचार्य-पुत्र अश्वत्थामा भी खारिज कर चुके थे, उन्हें कलियुग में शिक्षक समुदाय पर लादा जा सकेगा, यह कल्पना बेसिरपैर की है।ं

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