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फिलहाल उप्र में रैगिंग के खिलाफ कोई कानून नहीं!

रैगिंग के नाम पर छात्रों को सिगरेट से जलाया जा रहा है। रैगिंग पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बावजूद उत्तर प्रदेश में रैिगग कानून अब तक अस्तित्व में नहीं आ सका है। विधानमंडल ने रैिगग कानून को पास कर दिया लेकिन राज्य सरकार और राजभवन के झगड़े के बीच यह विधेयक ठंडे बस्ते में चला गया है। फिलहाल यूपी के कॉलेजों में रैगिंग को एक शासनादेश से रोका जा रहा है जिसकी कोई विधिक मान्यता नहीं है।ड्ढr राज्य में नया शैक्षिक सत्र शुरू होने के साथ रैगिंग का सिलसिला भी शुरू हो गया है। मेरठ के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में सीनियर छात्रों ने एक छात्र को सिगरेट से जलाया। उसे कमरे में बंद कर उसके कपड़े उतारने की कोशिश की गई।ड्ढr ‘उत्तर प्रदेश शैक्षणिक संस्थाआें में रैगिंग का प्रतिषेध विधेयक 2007’ बीते साल के अंत में विधानमंडल से पारित होने के बाद अंतिम मंजूरी के लिए राजभवन भेजा गया था। इस विधेयक में रैगिंग करने वाले, रैिगग में साथ देने वाले या रैगिंग का प्रचार करने वाले छात्रों को दो साल की कैद व 10 हजार रु. जुर्माना था।ड्ढr इस विधेयक में रैंगिंग की शिकायत मिलने पर शैक्षणिक संस्था को रैगिंग करने वाले छात्र-छात्राआें के खिलाफ जाँच के बाद कार्रवाई करने का अधिकार था। विश्वविद्यालय या कॉलेज प्रशासन जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति से पुलिस थाने में शिकायत भी भेज सकता था। विधेयक के मुताबिक रैगिंग करने वाले छात्रों को पाँच साल के लिए किसी भी शैक्षणिक संस्था में दाखिला नहीं मिलेगा। लेकिन इस विधेयक के तहत रैगिंग को लेकर कॉलेज से निकाला गया छात्र चाहे तो मंडलायुक्त से अपील कर सकता था।ड्ढr राजभवन को मुख्य आपत्ति विधेयक की अपील से संबंधित धारा-7 को लेकर थी। इसमंे निष्कासन या पाँच साल के लिए ‘डिबॉर’ किए गए छात्र को तीस दिन के अंदर मंडलायुक्त को अपील करने का अधिकार दिया गया था। राजभवन का मानना है कि इससे विश्वविद्यालय की स्वायत्ता प्रभावित होगी। अपील सुनने का अधिकार विश्वविद्यालय की कार्य परिषद को दिया जाना चाहिए जो विवि की सवर्ोच्च संस्था है। मंडलायुक्त को विश्वविद्यालय के मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं होना चाहिए।ड्ढr हैरत की बात है कि राजभवन ने इस महत्वपूर्ण विधेयक को पुनर्विचार के लिए सरकार को वापस तक नहीं किया। प्राविधिक शिक्षा के अधिकारियों का कहना है कि अगर राजभवन को किसी बिन्दु पर आपत्ति थी तो वह सुझाव के साथ विधेयक वापस कर सकते थे। इस बारे में शनिवार को ‘हिन्दुस्तान’ के पूछे जाने पर राजभवन के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि रैगिंग रोकने के लिए वर्तमान व्यवस्थाएँ पर्याप्त हैं।ड्ढr विभागीय सूत्रों के कहना है कि वर्तमान में रैगिंग को लेकर केवल शासनादेश है जिसकी कोई विधिक मान्यता नहीं है। यह शासनादेश केवल छात्रों पर केवल मनोवैज्ञानिक दबाव बनाता है, इससे रैगिंग के दोषी छात्रों पर प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं है।

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  • Web Title: फिलहाल उप्र में रैगिंग के खिलाफ कोई कानून नहीं!