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परिवार नियोजन पुरुषों की भी जिम्मेदारी

दिल्ली स्वास्थ्य मिशन की रिपोर्ट के अनुसार परिवार नियोजन के प्रति पुरुष अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे है। वे पहले भी उसके प्रति उदासीन थे और यह जिम्मेदारी महिलाआें को ही उठानी पड़ती थी। लेकिन इसमें भागीदारी बढ़ने के बजाय घट रही है। बताया गया है कि पिछले 25 साल में परिवार नियोजन का ऑपरेशन कराने में पुरुषों की संख्या आधी हो गई है जबकि महिलाआें की संख्या में ढाई गुना बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली इकॉनमिक सर्वे के मुताबिक 10.81 में 2,417 पुरुषों ने नसबन्दी कराई और 2005-06 में यह संख्या घटकर 1,616 हो गई, जबकि इसी अवधि में यह ऑपरेशन कराने वाली महिलाआें की संख्या जो 10.81 में 13,176 थी वह 2005-06 में बढ़कर 32,552 हो गई। हैल्थ मिशन की रिपोर्ट के अनुसार राजधानी में 25 प्रतिशत महिलाआें ने यह ऑपरेशन कराया तो पुरुषों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रह गई। पुरुष इसके प्रति गैरजानकार न होते हुए भी गैरजिम्मेदार साबित हुए हैं। हमारे समाज में स्त्री की यौनिकता को जिस तरह नियंत्रित रखा जाता है, उसमें बच्चे कब और कितने चाहिए यह निर्णय आम तौर पर महिलाआें के पास नहीं होता है, यह फैसला आम तौर पर पुरुष करता है। बच्चा नहीं चाहिए तो इसका उपाय औरत के जिम्मे होता है, जबकि औरत का ऑपरेशन ज्यादा जटिल होता है और पुरुष का ऑपरेशन अधिक सरल होता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकार तथा निजी कम्पनियों ने गर्भनिरोध के अधिकतर साधन महिलाआें को केन्द्र में रखकर बनाए हैं। इस तरह ये कार्यक्रम स्त्री उत्पीड़न के पितृसत्तात्मक तरीकों को मजबूती दिलाते प्रतीत होते हैं। कई बार ऐसे साधन जो मुनाफे को ध्यान में रखकर बिना पर्याप्त शोध के, बाजार में उतारे जाते हैं वे महिलाआें के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हुए हैं। कृत्रिम हारमोन इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोजन के अलग-अलग मिश्रण से बने तथा कभी एंटीहामर्ोन से बने गर्भनिरोधक अलग-अलग तरह से दिए जाते रहे हैं। जैसे खाने की गोली, सुई द्वारा, चमड़ी की तह में कैप्सूल या योनि में छल्ले रखकर आदि। ये सभी गम्भीर बीमारियों की सौगात लेकर आए। विकसित देशों में जो उपाय प्रतिबन्धित थे वे भी हमारे देश की महिलाआें पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हुए। जर्मनी की बनी नेट इन तथा अमेरिका में बना डेपोप्रोवेरा को भारी विरोध के बाद बन्द कर दिया गया था। ऐसा नहीं कि डॉक्टर समुदाय इन गर्भनिरोधक साधनों के खतरनाक प्रभावों के बारे में अनभिज्ञ है, लेकिन इनके जरिये महिला अधिकारों के उल्लंघन पर वह चुप्पी के षडय़ंत्र में शामिल हैं। यह भी दलील दी जाती है कि एक ऐसे मुल्क में जहां मातृमृत्यु दर अधिक है, वहां गर्भनिरोधक साधनों के खतरे के बारे में बात भी करने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अधिकतर महिलाएं इनके दुष्प्रभावों से परिचित होते हुए भी और कई बार न जानते हुए उन उपायों को अपनाने के लिए मजबूर हो जाती है। अब महिलाआें में एक हिस्सा ही सही अपने परिवार की संख्या के प्रति सजग हुआ है। उन्हें यह भी पता है कि बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी है, इसलिए उन्हें ही उपाय करने होंगे। इसके बावजूद अभी भी हमारे समाज में जागरुकता की कमी है। यदि जानकारी हो तो भी स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी, दूरदराज के इलाकों में सुविधाआें का न होना ये भी कारण है कि जिनसे चाहकर भी महिलाएं उन साधनों को अपना नहीं पाती। यह उपलब्ध हो तो ऑपरेशन कराने वाली महिलाआें की संख्या जो अभी ढाई गुना बढ़ी है वह और अधिक होगी। इसके अलावा परिवार नियंत्रण कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए विभिन्न स्तरों पर दमन का प्रयोग होता है। सरकार, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और दबाव समूह इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह दमन सिर्फ कानूनी या आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं होता, नौकरी के अवसरों या कल्याण के अन्य अवसरों से इनकार करके भी लोगों को मजबूर किया जाता है। ऐसा क्यों हुआ कि पुरुष जो अन्य सभी मामलों में स्वयं को ज्यादा समझदार और जागरुक मानते हैं वे गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल के प्रति कम जागरुक हैं। क्या पुरुष-प्रधान सोच का ही परिणाम नहीं है कि वे पुरानी गलत अवधारणा पर काबू पाने की जरूरत को नहीं समझ रहे हैं। मिथ को तोड़ने के लिए शायद और प्रयास की जरूरत है। यदि इस दिशा में प्रगति होगी तो महिलाआें पर ही इस जिम्मेदारी के बोझ में कमी आएगी। लेखिका महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं

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  • Web Title: परिवार नियोजन पुरुषों की भी जिम्मेदारी